नवरात्रि मनाने के पीछे ये हैं वैज्ञानिक कारण, जानें

नवरात्रि शब्द का शाब्दिक अर्थ है- 'नव अहोरात्र अर्थात नौ विशेष रात्रियां। नवरात्रि के समय आदिशक्ति मां दुर्गा के नव रूपों की उपासना की जाती है क्योंकि 'रात्रि' शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है

नई दिल्ली, यूपी किरण। नवरात्रि शब्द का शाब्दिक अर्थ है- ‘नव अहोरात्र अर्थात नौ विशेष रात्रियां। नवरात्रि के समय आदिशक्ति मां दुर्गा के नौ रूपों की उपासना की जाती है क्योंकि ‘रात्रि’ शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है। भारतीय ऋषि-मुनियों ने पूजा, उपासना आदि के लिए रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है। इसीलिए हिन्दू धर्म के सभी पिरमुख उत्सवों जैसे दीपावली,  होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि विभिन्न उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है।

क्या है नवरात्रि का वैज्ञानिक आधार

नवरात्रि के वैज्ञानिक महत्व को समझने के लिए हमें पहले नवरात्रि को समझ लेना आवश्यक हैं। हमारे ऋषि- मुनियों एवं मनीषियों ने एक वर्ष में दो बार नवरात्रों का विधान बनाया है। जिनमें एक विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से नौ दिन अर्थात नवमी तक तथा दूसरा ठीक उसके छह मास के पश्चात् आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक नवरात्रि मनाया जाता है। लेकिन, इन दोनों नवरात्रों में सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है।

यद्यपि नवरात्रि पूजन का रात्रि में ही करने का विधान है परन्तु आजकल अधिकांश उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं बल्कि दिन में ही पुरोहित बुलाकर संपन्न करा देते हैं। यह भी देखा गया है कि अब सामान्य भक्त के साथ-साथ, पंडित और साधु-महात्मा भी अब नवरात्रों में पूरी रात जागना नहीं चाहते और ना ही कोई आलस्य को त्यागना चाहता है। अब बहुत कम उपासक ही आलस्य को त्याग कर आत्मशक्ति, मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं।

हमारे मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझकर ही इन पूजन विधियों का निर्माण किया है। यह एक सर्वमान्य वैज्ञानिक तथ्य है कि रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं जिसका ज्ञान हमारे ऋषि-मुनियों को आज से कितने ही हजारों-लाखों वर्ष पूर्व ही हो गया था। अगर आप गौर करें तो पाएंगे कि अगर दिन में आवाज दी जाए, तो वह दूर तक नहीं जाती है, किंतु यदि रात्रि में आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है। इसके पीछे दिन के कोलाहलपूर्ण वातावरण के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें भी ध्वनि की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं।

रेडियो इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण है। अक्सर देखा जाता है कि कम फ्रीक्वेंसी के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है। इसका वैज्ञानिक सिद्धांत यह है कि सूर्य की किरणें दिन के समय रेडियो तरंगों को जिस प्रकार रोकती हैं ठीक उसी प्रकार मंत्र जाप की विचार तरंगों में भी दिन के समय रुकावट पड़ती है। इसीलिए ऋषि-मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है। मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर-दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है।

यही रात्रि का तर्कसंगत रहस्य है। जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपनी शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं, उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि, उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य होती है।

वैज्ञानिक आधार

नवरात्र के पीछे का एक वैज्ञानिक आधार यह भी है कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधियां हैं जिनमें से मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणुओं के प्रसार व आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतुओं के परिवर्तन के समय अक्सर शारीरिक बीमारियां बढ़ती हैं। अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए तथा शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तन-मन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम ‘नवरात्र’ है।

नवरात्र में नौ रात को गिना जाना चाहिए

चूंकि अमावस्या की रात से अष्टमी तक या प्रतिपदा से नवमी की दोपहर तक यह व्रत नियम चलता है इसी वजह से नौ रात यानी ‘नवरात्र’  नाम सार्थक है। रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है और, इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है।

नवरात्रि व्रत शरीर को करता है शुद्ध

हालांकि शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुद्धि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर 6 माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है जिसमें सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुद्धि, साफ-सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुद्ध होता है, क्योंकि स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।

यद्यपि धर्म, अध्यात्म और ज्योतिष की दृष्टि से नवरात्रि का अपना विशेष महत्व है परन्तु उसके साथ ही शाथ वैज्ञानिक दृष्टि से भी नवरात्रि का अपना महत्व है। ऋतु बदलने के साथ समय रोग जिन्हें आसुरी शक्ति कहते हैं का अंत करने के लिए हवन, पूजन आदि किया जाता है जिसमें कई तरह की जड़ी-बूटियों और वनस्पतियों का प्रयोग किया जाता है। इन जड़ी-बूटियों और वनस्पतियों के दहन से उत्पन्न होने वाली ऊष्मा, सुगन्ध व धुंआ वगतावरण में उपस्थित विभिन्न प्रकार के कीटाणुओं को नष्ट करती है।

हमारे ऋषि मुनियों ने न सिर्फ धार्मिक दृष्टि को ध्यान में रख कर नवरात्रि में व्रत और हवन पूजन करने के लिए कहा है बल्कि इसका वैज्ञानिक आधार भी है। नवरात्रि के दौरान व्रत और हवन पूजन स्वास्थ्य के लिए बहुत ही बढिय़ा है। इसका कारण यह है कि चारों नवरात्रि ऋतुओं के संधिकाल में होते हैं यानी इस समय मौसम में बदलाव होता है जिससे शारीरिक और मानसिक बल की कमी आती है। शरीर और मन को पुष्ट और स्वस्थ बनाकर नए मौसम के लिए तैयार करने के लिए व्रत किया जाता है।

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