प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दूबे के बाद प्रमुख सचिव विधान परिषद् राजेश सिंह की नियुक्ति और सेवा विस्तार पर उठे सवाल, जिम्मेदारों ने साधा मौन !
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भ्रष्टाचार के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस की नीति को लेकर मुखर रहते हैं वहीँ उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दूबे की नियुक्ति को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में लंबित अधिकार पृच्छा (Quo Warranto) याचिका मीडिया में सुर्खियां बटोर रही है। नियुक्ति में भ्रष्टाचार के चलते भी प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दूबे का नाम अक्सर चर्चा में रहता है। ताज़ा मामला अब उत्तर प्रदेश विधान परिषद के प्रमुख सचिव राजेश सिंह की नियुक्ति और लगातार दिये गये सेवा विस्तार को लेकर भी नया विवाद खड़ा हो गया है। मुख्यमंत्री कार्यालय में की गई शिकायत के बाद इस पूरे प्रकरण ने प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है।
शिकायत के अनुसार राजेश सिंह का जन्म वर्ष 1958 में हुआ था। वर्ष 2018 में उन्हें प्रमुख सचिव के रूप में नियुक्ति मिली। उस समय उनकी आयु लगभग 60 वर्ष थी। सामान्य सेवा नियमों के अनुसार वर्ष 2023 में उन्हें सेवानिवृत्त हो जाना चाहिए था। इसके बावजूद वे आज भी प्रमुख सचिव के पद पर कार्यरत हैं, जिससे उनकी नियुक्ति और सेवा विस्तार की वैधानिकता पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक 15 जुलाई 2023 को उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सभापति द्वारा राजेश सिंह को छह माह का सेवा विस्तार दिया गया। इसके बाद 15 जनवरी 2024 को पुनः छह माह का सेवा विस्तार प्रदान किया गया। आरोप है कि प्रत्येक आदेश में "सेवा विस्तार" के स्थान पर "पुनर्नियोजन" शब्द का प्रयोग किया गया, जबकि वास्तविक उद्देश्य सेवा अवधि बढ़ाना था।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि उत्तर प्रदेश विधान परिषद सचिवालय (भर्ती एवं सेवा की शर्तें) नियमावली, 1976 के तहत प्रमुख सचिव को सेवा विस्तार देने का अधिकार सभापति को प्राप्त ही नहीं है। उनका दावा है कि ऐसा अधिकार मुख्यमंत्री के स्तर पर निहित है। इसी आधार पर सेवा विस्तार अथवा पुनर्नियोजन संबंधी आदेशों की वैधता पर गंभीर प्रश्न उठाये गये हैं।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि यदि वर्ष 2026 तक भी राजेश सिंह प्रमुख सचिव के पद पर कार्यरत हैं, तो उन्हें अब तक आधा दर्जन से अधिक बार सेवा विस्तार अथवा पुनर्नियोजन दिया जा चुका होगा। शिकायतकर्ताओं ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराकर सभी आदेशों की वैधानिक समीक्षा कराने की मांग की है।
राजेश सिंह का कार्यकाल पहले भी विवादों में रह चुका है। विधान परिषद में समीक्षा अधिकारी (RO) एवं सहायक समीक्षा अधिकारी (ARO) भर्ती में कथित अनियमितताओं का मामला न्यायालय तक पहुंचा था, जहां जांच से संबंधित कार्यवाही भी हुई थी।
शिकायत में यह आरोप भी लगाया गया है कि राजेश सिंह के प्रमुख सचिव रहते हुए उन्होंने अपने निकट संबंधियों/ करीबियों को लाभ पहुंचाया। की गयी शिकायत के मुताबिक विक्रम सिंह को प्रतापगढ़ जिलाधिकारी कार्यालय से स्थानांतरित कराकर विधान परिषद में सहायक समीक्षा अधिकारी के पद पर तैनात कराया गया, वहीँ एक अन्य निकट संबंधी गोपाल सिंह को विधान परिषद के लेखा विभाग में नियुक्त कराया गया। इन आरोपों की शिकायत मुख्यमंत्री कार्यालय में भी किए जाने का दावा किया गया है।
राजेश सिंह द्वारा इस प्रकरण में अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल पायी है साथ ही उत्तर प्रदेश विधान परिषद सचिवालय अथवा अन्य किसी संबंधित की ओर से अब तक किसी प्रकार की कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में शिकायतों में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। मामले की सत्यता और वैधानिक स्थिति पर अंतिम निर्णय सक्षम प्राधिकारी अथवा न्यायालय के समक्ष होने वाली कार्यवाही के बाद ही स्पष्ट होगा।