यूपी में कांग्रेस का सबसे बड़ा दांव, मायावती और चंद्रशेखर के किले में सेंध लगाने आया ये दिग्गज नेता
उत्तर प्रदेश की राजनीति में करीब 35 साल से सत्ता से बाहर कांग्रेस अब अपने पुराने जनाधार को फिर से मजबूत करने की कोशिश में है। पार्टी ने संगठन में बड़ा बदलाव करते हुए अविनाश पांडेय की जगह राजेंद्र पाल गौतम को यूपी का नया प्रभारी बनाया है। यह कदम खास तौर पर दलित मतदाताओं को फिर से जोड़ने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
राजेंद्र पाल गौतम हाल ही में यूपी पहुंचे हैं और 2027 विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पार्टी की जमीनी तैयारी को दिशा देने में जुटे हैं।
दलित नेतृत्व पर कांग्रेस का फोकस
राजेंद्र पाल गौतम दिल्ली से आते हैं और दलित समुदाय से संबंध रखते हैं। वे पहले आम आदमी पार्टी में मंत्री रह चुके हैं और बाद में कांग्रेस में शामिल हुए। वर्तमान में वे पार्टी के अनुसूचित जाति और जनजाति मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं।
कांग्रेस ने उन्हें ऐसे समय पर यूपी की जिम्मेदारी दी है जब राज्य में दलित राजनीति पहले से ही कई मजबूत नेताओं के प्रभाव में है। इनमें बसपा प्रमुख मायावती और भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद जैसे नाम शामिल हैं।
दलित वोट बैंक पर कांग्रेस की पकड़ ढीली
आजादी के बाद लंबे समय तक दलित मतदाता कांग्रेस का अहम आधार रहे। लेकिन 1980 के दशक के बाद स्थिति बदल गई। बसपा के उभार के बाद दलित वोट कांग्रेस से दूर हो गया।
कांशीराम ने दलित समाज में राजनीतिक जागरूकता बढ़ाई और बसपा को मजबूत किया। धीरे-धीरे दलित मतदाता बसपा के साथ जुड़ते गए और कांग्रेस कमजोर होती गई।
मायावती के नेतृत्व में बसपा ने चार बार यूपी में सरकार बनाई। इस दौरान कांग्रेस राज्य की राजनीति में हाशिये पर चली गई।
कांग्रेस के पिछले प्रयोग और असफलताएं
- दलित वोट वापस पाने के लिए कांग्रेस पहले भी कई कोशिशें कर चुकी है।
- 1990 के दशक में सुशील कुमार शिंदे को यूपी का प्रभारी बनाया गया था। लेकिन वे दलित वोट को पार्टी से जोड़ने में सफल नहीं हो सके।
- इसके बाद प्रियंका गांधी के समय में बृजलाल खाबरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। लेकिन निकाय चुनाव में पार्टी कोई बड़ा प्रदर्शन नहीं कर पाई।
- अब राजेंद्र पाल गौतम को तीसरे बड़े प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है।
दलित राजनीति की मौजूदा तस्वीर
उत्तर प्रदेश में दलित आबादी लगभग 22 प्रतिशत है। इसमें करीब 14 प्रतिशत जाटव समुदाय है जो बसपा का मुख्य आधार माना जाता है। वहीं लगभग 8 प्रतिशत गैर-जाटव दलित हैं जिनका वोट कई हिस्सों में बंटा रहता है।
पिछले कुछ चुनावों में गैर-जाटव दलितों का रुझान कभी बसपा, कभी बीजेपी और कभी सपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर देखा गया है। लेकिन कोई स्थायी राजनीतिक झुकाव नहीं बन पाया है।
कांग्रेस के रणनीतिकार मानते हैं कि बसपा की कमजोर होती स्थिति के कारण दलित वोट अब फिर से खुले विकल्प की तलाश में है। पार्टी को उम्मीद है कि वह अपने पुराने वोट बैंक को दोबारा जोड़ सकती है।
हाल ही में राहुल गांधी ने कांशीराम जयंती पर लखनऊ में एक कार्यक्रम में भाग लेकर दलित समुदाय को राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की थी।
मायावती और चंद्रशेखर की चुनौती
दलित वोटों की राजनीति में अभी भी मायावती सबसे बड़ा चेहरा बनी हुई हैं। वे लगातार कांग्रेस की कोशिशों को लेकर सतर्क हैं और अपने समर्थकों को कांग्रेस से दूर रहने की सलाह देती रही हैं। दूसरी ओर चंद्रशेखर आजाद भी दलित वोटों को अपने पक्ष में करने की कोशिश में सक्रिय हैं।