UP में SP-कांग्रेस गठबंधन में फंसा पेंच: 200 सीटों पर कांग्रेस की दावेदारी, छोटे दलों ने थामा राहुल का हाथ
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' के दो प्रमुख घटक दलों, समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस के बीच सीटों के तालमेल को लेकर रस्साकशी तेज हो गई है। राज्य में अपने मजबूत कैडर और बड़े जनाधार का हवाला देकर समाजवादी पार्टी अधिकांश सीटों पर मैदान में उतरने की रणनीति पर अड़ी है, जबकि कांग्रेस इस बार 50-50 के फॉर्मूले पर समझौता चाहती है। कांग्रेस रणनीतिकारों का तर्क है कि जब तक पर्याप्त सीटों पर पार्टी चुनाव ही नहीं लड़ेगी, तब तक जमीनी विस्तार और जीत की संभावना कैसे बनेगी।
सीटों के इस गतिरोध के बीच उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया समीकरण आकार लेता दिख रहा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में जो छोटे दल और क्षेत्रीय क्षत्रप समाजवादी पार्टी के साथ खड़े थे, वे अब अखिलेश यादव की बेरुखी के बाद राहुल गांधी से सीधे संपर्क साध रहे हैं। यदि कांग्रेस सपा से एक बड़ा चुनावी कोटा हासिल करने में कामयाब होती है, तो इन छोटे दलों को कांग्रेस के कोटे से चुनावी मैदान में उतरने का सीधा मौका मिल सकता है, जिसकी उम्मीद सपा खेमे में बेहद कम नजर आ रही है।
अपनी जनता पार्टी के प्रमुख स्वामी प्रसाद मौर्य और जनवादी पार्टी सोशलिस्ट के संजय चौहान ने हाल ही में राहुल गांधी से मुलाकात की है। पूर्वी और मध्य यूपी के गैर-यादव ओबीसी, विशेषकर चौहान और मौर्य मतदाताओं में इन नेताओं का अपना असर माना जाता है। इनके साथ ही अपना दल (कमेरावादी) के पंकज निरंजन भी निरंतर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के संपर्क में बने हुए हैं।
गठबंधन वार्ता के बीच उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने सपा नेतृत्व के सामने पार्टी का रुख स्पष्ट करते हुए कम से कम आधी सीटों की मांग रखी है। गौतम ने साफ कहा कि 150 सीटों पर बात करने का कोई औचित्य नहीं है, कांग्रेस 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी कर चुकी है।
दूसरी तरफ, सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस बार छोटे क्षेत्रीय दलों से एक निश्चित दूरी बना रखी है। 2022 चुनाव से ठीक पहले बना 'भागीदारी मोर्चा', जिसके संस्थापक पंकज निरंजन थे, अब सपा के बजाय कांग्रेस के पाले में खड़ा नजर आ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्ष 2017 में भाजपा ने भी इसी तरह गैर-प्रमुख जातियों के छोटे दलों को जोड़कर सोशल इंजीनियरिंग का सफल मॉडल तैयार किया था, जिस पर अब कांग्रेस आगे बढ़ती दिख रही है।
सीट शेयरिंग के इस सियासी घमासान में व्यावहारिक खींचतान भी शुरू हो गई है। सपा का कहना है कि कांग्रेस को केवल उन्हीं सीटों पर प्रत्याशी उतारने चाहिए जहां उसके पास जिताऊ चेहरे हों। वहीं, राहुल गांधी से मिलने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य ने करीब एक दर्जन सीटों की मांग रखी है, मगर पेंच चुनाव चिह्न पर फंस गया है। मौर्य अपनी पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ना चाहते हैं, जबकि कांग्रेस का स्पष्ट रुख है कि सहयोगी दलों के प्रत्याशियों को हाथ के निशान पर ही मैदान में उतरना होगा। प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के अनुसार पार्टी सूबे की सभी 403 सीटों पर संगठन को चाक-चौबंद कर रही है और जिला तथा शहर कमेटियों का गठन अंतिम दौर में है, हालांकि बातचीत के अनुकूल माहौल में सीटों के आंकड़े पर व्यावहारिक लचीलापन भी दिखाया जा सकता है।