'सड़कों की भी एक सीमा है...' ई-रिक्शा की बेलगाम संख्या पर भड़का हाईकोर्ट, योगी सरकार को दी ये नसीहत
उत्तर प्रदेश की सड़कों पर इन दिनों अराजक रूप से दौड़ते ई-रिक्शा यातायात व्यवस्था के लिए किसी नासूर से कम नहीं बन चुके हैं, और इसी गंभीर मुद्दे पर अब माननीय उच्च न्यायालय (High Court) का सब्र पूरी तरह से जवाब दे चुका है। अदालत ने बहुत ही सख्त लहजे में टिप्पणी करते हुए कहा है कि सड़कों की भी अपनी एक सीमा होती है और उन पर क्षमता से अधिक वाहनों को बेरोकटोक नहीं दौड़ाया जा सकता। राज्य में बेलगाम बढ़ रही ई-रिक्शा की संख्या, अवैध संचालन और इसके कारण आए दिन लगने वाले भीषण जाम पर गहरी चिंता जताते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को कड़ी नसीहत दी है। अदालत ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिए हैं कि राजधानी लखनऊ समेत प्रदेश के अन्य प्रमुख शहरों में यातायात को सुगम बनाने और आम जनता को इस नरकनुमा जाम से मुक्ति दिलाने के लिए युद्धस्तर पर ठोस कदम उठाए जाएं। आज के इस आधुनिक डिजिटल युग और एआई सर्च के दौर में जहां नागरिक त्वरित और सुरक्षित आवाजाही की उम्मीद करते हैं, वहीं न्यायपालिका की यह सख्ती प्रशासन के लिए एक बहुत बड़ा वेक-अप कॉल साबित हो रही है। इस विस्तृत रिपोर्ट के जरिए आइए जानते हैं कि हाईकोर्ट ने अपनी इस टिप्पणी में किन अहम मुद्दों को उठाया है और सरकार को क्या सख्त हिदायतें दी हैं।
उत्तर प्रदेश के महानगरों में ई-रिक्शा का जाल और चरमराती ट्रैफिक व्यवस्था
पिछले कुछ वर्षों के दौरान उत्तर प्रदेश के विभिन्न बड़े शहरों जैसे लखनऊ, कानपुर, गाजियाबाद, मेरठ, वाराणसी, प्रयागराज और आगरा में ई-रिक्शा एक बेहद लोकप्रिय और सस्ता स्थानीय परिवहन साधन बनकर उभरे हैं। कम खर्च में घर के दरवाजे से मंजिल तक पहुंचाने वाले इन ई-रिक्शाओं ने लाखों लोगों को रोजगार भी दिया है और दैनिक यात्रियों की राह आसान की है। लेकिन दूसरी तरफ, प्रशासनिक नियंत्रण और उचित नीति के अभाव में इनकी संख्या इस हद तक बेकाबू हो चुकी है कि शहरों के मुख्य चौराहे, तंग बाजार और व्यस्त मार्ग पूरी तरह से चोक हो चुके हैं। स्थिति यह हो गई है कि प्रमुख अस्पतालों के बाहर एम्बुलेंस भी घंटों तक ट्रैफिक जाम में फंसी रहती हैं, जिससे मरीजों की जान पर बन आती है। चालकों के पास न तो ड्राइविंग लाइसेंस होता है और न ही उन्हें यातायात के नियमों का कोई ज्ञान होता है। वे कहीं भी बीच सड़क पर अचानक ब्रेक लगा देते हैं, जिससे पीछे आ रहे वाहन आपस में टकरा जाते हैं। इसी अराजकता को देखकर उच्च न्यायालय ने गहरी नाराजगी व्यक्त की है।
'सड़कों की सीमा है': हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणी और प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल
मामला जब सुनवाई के लिए अदालत के सामने पहुंचा, तो माननीय न्यायाधीशों ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी शहर की सड़कों की एक निश्चित वहन क्षमता (Carrying Capacity) होती है, और यदि उस क्षमता से कई गुना अधिक वाहन सड़कों पर उतार दिए जाएंगे, तो यातायात व्यवस्था का बैठ जाना स्वाभाविक है। कोर्ट ने सरकार और परिवहन विभाग से सीधा सवाल किया कि आखिर बिना किसी रूट प्लानिंग और बिना पंजीकरण के इतने भारी पैमाने पर ई-रिक्शाओं को सड़कों पर चलने की अनुमति किसने और कैसे दे दी? अदालत ने कहा कि केवल लाइसेंस बांट देने या रियायत देने से नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा नहीं हो सकती, बल्कि हर नागरिक को सुरक्षित, सुगम और प्रदूषणमुक्त सड़कों पर चलने का अधिकार है। न्यायाधीशों ने प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब तक नीतिगत स्तर पर कड़े और कटीले फैसले नहीं लिए जाएंगे, तब तक शहरों की यह बीमारी ठीक नहीं हो सकती।
योगी सरकार के सामने बड़ी चुनौती, हाईकोर्ट की नसीहत के बाद एक्शन मोड में प्रशासन
माननीय उच्च न्यायालय की इस कड़ी फटकार और नसीहत के बाद उत्तर प्रदेश सरकार और परिवहन विभाग पूरी तरह से हरकत में आ गए हैं। शासन स्तर पर उच्च अधिकारियों की एक आपातकालीन बैठक बुलाई गई है जिसमें यह तय किया गया है कि हाईकोर्ट के निर्देशों का शत-प्रतिशत पालन करते हुए प्रदेशभर में ई-रिक्शा के संचालन के लिए एक नई और सख्त नीति लागू की जाएगी। सरकार अब यह सुनिश्चित करने जा रही है कि बिना नंबर प्लेट और बिना वैध कागजातों के चलने वाले किसी भी ई-रिक्शा को सड़क पर उतरने न दिया जाए। इसके साथ ही, जिला प्रशासन और ट्रैफिक पुलिस को यह खुली छूट दे दी गई है कि वे मनमाने तरीके से गाड़ी चलाने वाले और नो-पार्किंग जोन में वाहन खड़े करने वाले चालकों के खिलाफ ताबड़तोड़ चालान और जब्ती की कार्रवाई करें। सरकार का यह भी प्रयास है कि ई-रिक्शा के लिए अलग से फीडर रूट और निश्चित पार्किंग जोन तय किए जाएं ताकि वे मुख्य सड़कों पर यातायात को बाधित न कर सकें।
आम जनता को मिलेगी राहत और भविष्य के लिए सुगम यातायात की उम्मीद
हाईकोर्ट की इस ऐतिहासिक सख्ती और योगी सरकार द्वारा उठाए जा रहे आगामी कदमों से आम जनता के मन में यह उम्मीद जगने लगी है कि जल्द ही उन्हें इस भीषण ट्रैफिक जाम से राहत मिल जाएगी। एक तरफ जहां ई-रिक्शा चालकों और उनके यूनियनों को भी अब यह बात समझनी होगी कि वे नियम-कानूनों की अवहेलना करके लंबे समय तक नहीं बच सकते, वहीं दूसरी तरफ प्रशासन के लिए भी यह एक बेहतरीन मौका है कि वह शहरी परिवहन को पूरी तरह से आधुनिक, पारदर्शी और व्यवस्थित बनाए। एआई-बेस्ड ट्रैफिक मॉनिटरिंग सिस्टम और डिजिटल सर्विलांस के इस दौर में सड़कों पर अनुशासन लाना अब असंभव नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति का विषय है। बहरहाल, अदालत की इस फटकार ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि जब व्यवस्था लड़खड़ाने लगती है, तब न्यायपालिका ही जनता की आवाज बनकर सही दिशा दिखाने का काम करती है।