कौन हैं राजपाल सैनी? बसपा से राजनीतिक शुरुआत
उत्तर प्रदेश की राजनीति में गठबंधन, पाला बदलने और चुनावी समीकरणों के लिहाज से पश्चिमी यूपी का क्षेत्र हमेशा से सबसे संवेदनशील माना जाता रहा है। इस बेल्ट में अपनी मजबूत पकड़ और ओबीसी वोटों में अच्छी खासी दखल रखने वाले दिग्गज नेता राजपाल सैनी (Rajpal Saini) एक बार फिर से सुर्खियों में आ गए हैं। अपने तीन दशक से अधिक लंबे राजनीतिक करियर में कभी बहुजन समाज पार्टी के खास सिपहसालार रहे, तो कभी राष्ट्रीय लोकदल और भारतीय तथा समाजवादी खेमे की धुरी रहे राजपाल सैनी ने एक बार फिर अपनी पुरानी पार्टी यानी समाजवादी पार्टी (SP) में वापसी कर ली है। उनके इस बार-बार पाला बदलने के इतिहास ने राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर यह चर्चा छेड़ दी है कि आखिर राजपाल सैनी कौन हैं और उनका यह सियासी सफर किस प्रकार उत्तर प्रदेश के सत्ता समीकरणों को प्रभावित करता आया है। आइए एक वरिष्ठ राजनीतिक और इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर की नजर से गहराई से जानते हैं कि राजपाल सैनी का राजनीतिक सफर कैसा रहा है और उन्होंने कब-किस पार्टी के साथ अपनी राजनीतिक पारी खेली है।
ओवरसियर की सरकारी नौकरी छोड़कर मैदान में उतरे थे राजपाल सैनी, जनता दल से की थी शुरुआत
मुजफ्फरनगर जिले के लूहसाना गांव के रहने वाले राजपाल सैनी ने अपने करियर की शुरुआत किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि से नहीं, बल्कि एक सरकारी कर्मचारी के रूप में की थी। शुरुआती दौर में उन्होंने बिजली विभाग यानी हाइडिल में ओवरसियर की नौकरी की थी, लेकिन उनके भीतर का राजनीतिक वक्ता और सामाजिक रूप से कुछ बड़ा करने की इच्छा उन्हें ज्यादा दिनों तक इस नौकरी में नहीं रख सकी। वर्ष 1989 के दौर में उन्होंने सरकारी नौकरी को अलविदा कह दिया और पूरी तरह से राजनीति के मैदान में कूद पड़े। शुरुआती दौर में वह जनता दल से जुड़े और पार्टी के भीतर अपनी सक्रियता के दम पर जल्द ही जनता दल के प्रदेश महासचिव जैसे महत्वपूर्ण पद तक जा पहुंचे। उस दौर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में जनता दल का खासा प्रभाव हुआ करता था और यहीं से राजपाल सैनी ने अपनी सियासी जमीन तैयार करनी शुरू कर दी थी।
मुलायम सिंह यादव के बुलावे पर समाजवादी पार्टी में हुई एंट्री और फिर बसपा का दामन
नब्बे के दशक के मध्य में जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था, तब राजपाल सैनी ने सपा का रुख किया। वर्ष 1994 में मुलायम सिंह यादव के कहने पर वह समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए और पार्टी ने उन्हें मुजफ्फरनगर का जिला अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। उन्होंने लगातार चार वर्षों तक इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया और जिले में पार्टी संगठन को मजबूत किया। हालांकि, कुछ समय बाद उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (BSP) का दामन थाम लिया, जो उनके राजनीतिक जीवन का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। बसपा में रहते हुए उन्होंने संगठन में काम किया और पार्टी के जिलाध्यक्ष से लेकर तमाम बड़े पदों की जिम्मेदारी संभाली। बसपा सुप्रीमो मायावती के नेतृत्व में पिछड़े और दलित समीकरणों को साधते हुए उन्होंने अपनी राजनीतिक पैठ को और अधिक मजबूत किया।
विधायक से लेकर सांसद और राज्यमंत्री बनने तक का सफर: बसपा में मिला था बड़ा कद
वर्ष 1999 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने उन्हें मुजफ्फरनगर संसदीय सीट से अपना आधिकारिक उम्मीदवार बनाया, हालांकि उस चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली, लेकिन उनकी सक्रियता लगातार बनी रही। इसके बाद वर्ष 2002 में उन्होंने मोरना विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और शानदार जीत दर्ज कर उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुंचे। विधायक बनने के बाद मायावती सरकार में उन्हें युवा कल्याण एवं खेल राज्य मंत्री जैसी अहम जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके बाद वर्ष 2007 में उन्हें उत्तर प्रदेश राज्य खाद एवं बीज निगम का चेयरमैन बनाया गया। उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और संगठन के प्रति निष्ठा को देखते हुए बसपा ने उन्हें वर्ष 2010 में देश के उच्च सदन यानी राज्यसभा का सांसद बनाकर दिल्ली भेज दिया। इस तरह राजपाल सैनी बहुजन समाज पार्टी के शासनकाल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े और ताकतवर ओबीसी चेहरों में से एक बनकर उभरे।
बसपा से रालोद, फिर सपा और भाजपा का सफर तय कर दोबारा साइकिल पर लौटे राजपाल
जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश में राजनीतिक समीकरण बदले, राजपाल सैनी की निष्ठा भी बदलती गई। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बसपा से हटकर अपने बेटे शिवान सैनी को मैदान में उतारा, और बाद के वर्षों में वे राष्ट्रीय लोकदल (RLD) और समाजवादी पार्टी के गठबंधन के साथ जुड़ गए। वर्ष 2021 में उन्होंने औपचारिक रूप से समाजवादी पार्टी का दामन थामा और 2022 का विधानसभा चुनाव खतौली सीट से रालोद-सपा गठबंधन के टिकट पर लड़ा। हालांकि, कुछ समय बाद उन्होंने पाला बदलकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का रुख कर लिया था और भगवा खेमे में शामिल हो गए थे। लेकिन अब चुनावी सरगर्मी के बीच उन्होंने एक बार फिर भाजपा का साथ छोड़कर समाजवादी पार्टी में वापसी कर ली है, जिससे यह साबित होता है कि पश्चिमी यूपी की सियासत में टिकट और जातिगत समीकरणों के हिसाब से नेता पाला बदलने मेंराजी रहते हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में कितना असर डालेगी राजपाल सैनी की घर वापसी?
राजपाल सैनी का सैनी समाज (OBC) पर अच्छा-खासा प्रभाव माना जाता है, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में यह बिरादरी चुनावी हार-जीत तय करने की क्षमता रखती है। यही वजह है कि जब भी राजपाल सैनी पार्टी बदलते हैं, तो उस क्षेत्र के राजनीतिक समीकरण पूरी तरह हिल जाते हैं। समाजवादी पार्टी में उनकी यह घर वापसी पार्टी केित राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा आगामी चुनावों में गैर-जाट ओबीसी वोटों को साधने और अपने पाले में मजबूत करने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। देखना यह होगा कि दल-बदल के लंबे इतिहास वाले राजपाल सैनी अपनी इस नई पुरानी पारी में पार्टी के लिए कितने कारगर साबित होते हैं और जनता उनके इस फैसले को किस रूप में लेती है।