शराब की भयंकर लत से मिलेगी मुक्ति: दून के डॉक्टरों ने खोजी बिना चीर-फाड़ वाली तकनीक, हल्के करंट से बुझेगी तलब!
शराब की लत (Alcohol Dependence Syndrome) से जूझ रहे मरीजों और उनकी असहनीय तड़प (क्रेविंग) को शांत करने की दिशा में चिकित्सा जगत से बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है।
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित दो प्रमुख चिकित्सा संस्थानों—हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (HIMS) और श्री गुरु राम राय (SGRR) मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विशेषज्ञों ने मस्तिष्क को उत्तेजित करने वाली 'ब्रेन स्टिमुलेशन' यानी ट्रांसक्रेनियल डायरेक्ट करंट स्टिमुलेशन (tDCS) तकनीक का सफल क्लिनिकल ट्रायल पूरा कर लिया है। इस अत्याधुनिक शोध के सकारात्मक नतीजों को विख्यात अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल 'प्राइमरी केयर कंपेनियन फॉर सीएनएस डिसऑर्डर्स' ने भी प्रकाशित कर अपनी आधिकारिक मुहर लगा दी है।
खोपड़ी पर इलेक्ट्रोड लगाकर 2mA का हल्का करंट, 5 दिनों में दोगुना असर
शोध दल के प्रमुख विशेषज्ञ डॉ. प्रियरंजन अविनाश एवं डॉ. रॉबिन विक्टर ने अध्ययन की कार्यप्रणाली साझा करते हुए स्पष्ट किया कि यह पूरी तरह नॉन-इनवेसिव यानी शरीर में बिना कोई कट या चीर-फाड़ लगाए की जाने वाली प्रक्रिया है। इस थेरेपी के तहत मरीज के सिर (खोपड़ी) के ऊपर विशेष इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं, जिसके माध्यम से मस्तिष्क के 'डॉर्सोलैटरल प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स' हिस्से में 2 मिलीएम्पीयर (2mA) का बेहद हल्का विद्युत प्रवाह (करंट) दिया जाता है।
ट्रायल के दौरान मरीजों को लगातार पांच दिनों तक रोजाना 20-20 मिनट की अवधि वाले दो अलग-अलग सेशन दिए गए। इसके परिणाम बेहद चौंकाने वाले और उत्साहजनक रहे। छद्म या नकली उपचार (जिसमें क्रेविंग स्कोर में केवल 7.08 अंक की कमी आई) की तुलना में वास्तव में हल्का करंट पाने वाले मरीजों की शराब पीने की तीव्र इच्छा में दोगुनी यानी 14.17 अंक की भारी गिरावट दर्ज की गई।
दवा के साइड इफेक्ट से मिलेगा छुटकारा, खास निगरानी में होगा उपचार
क्लिनिकल ट्रायल के नतीजों पर विस्तार से बात करते हुए डॉ. विक्टर ने बताया कि नशा मुक्ति के दौरान अक्सर ऐसे मरीज सामने आते हैं जो या तो नियमित गोलियां खाना पसंद नहीं करते, या फिर पारंपरिक दवाओं के गंभीर साइड इफेक्ट्स से जूझते हैं।
ऐसे लोगों के लिए यह ब्रेन स्टिमुलेशन तकनीक एक अचूक और सुरक्षित विकल्प बनकर उभरी है क्योंकि इसका कोई भी दुष्प्रभाव (साइड इफेक्ट) नहीं देखा गया है। हालांकि, विशेषज्ञों ने यह साफ तौर पर आगाह किया है कि इस तकनीक को घर पर आजमाने की गलती कतई न करें; यह पूरी प्रक्रिया विशेष रूप से डिजाइन की गई चिकित्सा मशीनों और योग्य मनोरोग विशेषज्ञों की सीधी निगरानी में ही संपन्न की जाती है।
देहरादून के टर्शरी सेंटर में हुआ ट्रायल, नशा मुक्ति केंद्रों के लिए संजीवनी
इस महत्वपूर्ण शोध दल में दून के जाने-माने मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. ट्विंकल शर्मा, डॉ. प्रियरंजन अविनाश, डॉ. रॉबिन विक्टर, डॉ. प्रवीण रिखारी और डॉ. शोभित गर्ग शामिल रहे। यह व्यापक क्लिनिकल परीक्षण देहरादून के एक प्रतिष्ठित टर्शरी साइकियाट्री सेंटर में 18 से 60 वर्ष की आयु सीमा वाले गंभीर रूप से शराब पर निर्भर मरीजों पर 2023 से 2025 के बीच सफलतापूर्वक संचालित किया गया था।
चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि अस्पताल में भर्ती होने के शुरुआती दिनों में जब मरीज को शराब की सबसे भयंकर तलब उठती है, तब प्राथमिक डिटॉक्सिफिकेशन दवाओं के साथ इसे एक सहायक उपचार के तौर पर इस्तेमाल करना क्रांतिकारी साबित होगा। यह तकनीक सुरक्षित, कम खर्चीली और मरीजों द्वारा आसानी से सहन की जाने वाली है, जो भविष्य में देशभर के नशा मुक्ति केंद्रों की तस्वीर बदल सकती है।