Up Kiran, Digital Desk: प्रदेश कांग्रेस का मानना है कि वाममोर्चा के साथ गठबंधन से पार्टी को अब कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिल रहा है। ऐसे में कांग्रेस के लिए अकेले चुनाव मैदान में उतरना ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है। पार्टी नेताओं का कहना है कि पिछले अनुभवों से साफ हो गया है कि गठबंधन कांग्रेस की चुनावी ताकत को बढ़ाने में असफल रहा है।
हालांकि, कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी अब भी माकपा के नेतृत्व वाले वाममोर्चा के साथ गठबंधन के पक्षधर हैं। वे मानते हैं कि विपक्षी वोटों के बिखराव को रोकने के लिए गठबंधन जरूरी है।
प्रदेश कांग्रेस की मौजूदा इकाई का कहना है कि यदि शीर्ष नेतृत्व वाममोर्चा के साथ समझौते का फैसला करता है, तो यह गठबंधन 50-50 सीटों के फार्मूले पर होना चाहिए। इससे पहले कांग्रेस और वाममोर्चा के बीच सीटों का बंटवारा 2:1 के अनुपात में होता रहा है, लेकिन अब कांग्रेस आधी सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग कर रही है।
प्रदेश कांग्रेस की योजना करीब 100 से 125 सीटों पर गंभीरता से चुनाव लड़ने की है। पार्टी का आकलन है कि इस स्थिति में वह 15 से 25 सीटों पर जीत दर्ज कर सकती है, क्योंकि मालदा, मुर्शिदाबाद और कूचबिहार जैसे कुछ जिलों में अब भी कांग्रेस की मजबूत मौजूदगी मानी जाती है।
हालांकि, इस मुद्दे पर अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। शुक्रवार को कोलकाता में होने वाली कांग्रेस की राज्य कमेटी की बैठक में इस प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा की जाएगी।
दरअसल, कांग्रेस पिछले चुनावों में गठबंधन के अनुभव से निराश रही है। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने वाममोर्चा और इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। उस दौरान कांग्रेस ने करीब 92 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन पार्टी एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हो सकी, जिसने मौजूदा रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।




