पाकिस्तान में 160 टुकड़ों का नया प्लान, क्या प्रांतों को बांटकर सत्ता पर एकाधिकार चाहते हैं आर्मी चीफ आसिम मुनीर

पाकिस्तान में 160 टुकड़ों का नया प्लान, क्या प्रांतों को बांटकर सत्ता पर एकाधिकार चाहते हैं आर्मी चीफ आसिम मुनीर

पाकिस्तान की लड़खड़ाती हुकूमत और चरमराते सियासी ढांचे के बीच मुल्क के नए भौगोलिक और प्रशासनिक बंटवारे की सुगबुगाहट ने भूचाल ला दिया है। इस विवादित बहस की शुरुआत तब हुई जब सेना के बेहद करीबी माने जाने वाले संघीय गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने 30 जुलाई को सार्वजनिक रूप से कहा कि पाकिस्तान की मौजूदा शासन व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है।

नकवी ने इसका हल पेश करते हुए सुझाव दिया कि मुल्क में या तो नए प्रांत बनाए जाएं अथवा पूरी प्रशासनिक सत्ता को 160 छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजित कर दिया जाए। गृह मंत्री के इस बयान के सामने आते ही सियासी गलियारों में यह चर्चा गर्म हो गई है कि यह महज प्रशासनिक सुधार का खाका नहीं, बल्कि देश पर सैन्य प्रतिष्ठान की पकड़ को कानूनी रूप से मुकम्मल करने की एक सोची-समझी बिसात है।

18वें संशोधन पर निशाना और सेना का बजट संकट: क्या है मुनीर का असली गेमप्लान?

'स्टेट न्यूज़ ग्लोबल' की एक विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर देश के मौजूदा चार प्रांतों के पुनर्गठन और बंटवारे की पुरजोर वकालत कर रहे हैं। इस पूरी कवायद का मुख्य निशाना वर्ष 2010 में पारित हुआ ऐतिहासिक 18वां संवैधानिक संशोधन है। इस संशोधन ने नेशनल फाइनेंस कमीशन (NFC) अवॉर्ड के तहत केंद्र के विभाज्य टैक्स पूल का 57.5 फीसदी बड़ा हिस्सा सीधे प्रांतों को सौंपकर उन्हें वित्तीय स्वायत्तता प्रदान की थी। इसके परिणामस्वरूप इस्लामाबाद स्थित केंद्र सरकार और परोक्ष रूप से सेना के हिस्से में अपने भारी-भरकम बजट और सुरक्षा खर्चों के लिए फंड की भारी कमी होने लगी।

विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा दौर में सेना अतीत की तरह सीधे सैन्य तख्तापलट (मार्शल लॉ) कर सत्ता नहीं हथियाना चाहती, क्योंकि आर्थिक तंगी से त्रस्त अवाम का गुस्सा सीधे भड़क सकता है। इसके बजाय रणनीति यह बनाई गई है कि एक चुनी हुई कमजोर नागरिक सरकार के रोजमर्रा के कामकाज, अर्थव्यवस्था और नीति-निर्माण में सेना को स्थायी तौर पर भागीदार बना दिया जाए।

स्पेशल इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल (SIFC): अर्थव्यवस्था पर सेना का सीधा नियंत्रण

नागरिक प्रशासन और अर्थव्यवस्था पर सैन्य नियंत्रण को संस्थागत रूप देने का मॉडल पहले ही धरातल पर उतारा जा चुका है। वर्ष 2022 में गठित की गई 'स्पेशल इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल' (SIFC) इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। वर्तमान समय में पाकिस्तान के भीतर होने वाले विदेशी निवेश और डॉलर से जुड़े सभी बड़े वित्तीय लेन-देन इसी शक्तिशाली संस्था की निगरानी में तय होते हैं। रणनीतिकारों के अनुसार, सेना प्रमुख खुद इस काउंसिल के शीर्ष बोर्ड में शामिल होते हैं, जबकि सेना के अन्य वरिष्ठ जनरलों को इसके निर्णयों और नीतियों को लागू कराने की सीधी कमान सौंपी गई है।

संविधान का पेच: संसद में दो-तिहाई बहुमत और अनुच्छेद 239(4) की दीवार

कागजी मंसूबे चाहे जितने भी बड़े हों, लेकिन प्रांतों को टुकड़ों में बांटने की आसिम मुनीर की यह महात्वाकांक्षा संवैधानिक रूप से इतनी आसान नहीं है। पाकिस्तान के संविधान में किसी भी संशोधन को अमलीजामा पहनाने के लिए सीनेट और नेशनल असेंबली (संसद के दोनों सदनों) में दो-तिहाई बहुमत की अनिवार्य दरकार होती है। बिलावल भुट्टो जरदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) किसी भी सूरत में सिंध के विभाजन के प्रस्ताव पर रजामंद नहीं होगी। ऐसे नाजुक मोड़ पर इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) का रुख निर्णायक हो सकता है, लेकिन सेना के साथ जारी भीषण तनातनी के चलते पीटीआई द्वारा इस योजना का समर्थन करने की गुंजाइश न के बराबर है।

यदि किसी सियासी जोड़-तोड़ से यह संशोधन संसद से पारित करा भी लिया जाए, तो भी संविधान का अनुच्छेद 239(4) सबसे बड़ा कानूनी रोड़ा बनकर सामने खड़ा है। इस संवैधानिक प्रावधान के अनुसार, किसी भी प्रांत की सीमाओं में बदलाव करने वाला संशोधन तब तक राष्ट्रपति की औपचारिक मंजूरी के लिए नहीं भेजा जा सकता, जब तक कि संबंधित प्रांतीय विधानसभा से इसे दो-तिहाई बहुमत से पारित न करा लिया जाए। सिंध के मुख्यमंत्री पहले ही विधानसभा के पटल पर दो टूक चेतावनी दे चुके हैं कि सिंध एक था, एक है और हमेशा एक ही रहेगा।

20 से 30 नई इकाइयां और थ्री-स्टार जनरलों की फौज: सेना का संगठनात्मक विस्तार

तमाम राजनीतिक और संवैधानिक विरोधों के बावजूद जनरल मुनीर इस योजना पर इतना जोर क्यों दे रहे हैं? विशेषज्ञों का आकलन है कि इसका सीधा संबंध पाकिस्तानी सेना के अंदरूनी ढांचे, प्रमोशन और संगठनात्मक विस्तार से जुड़ा है। वर्तमान व्यवस्था में पाकिस्तान के नौ कोर कमांड देश के चार मौजूदा प्रांतों की सीमाओं के अनुसार संचालित होते हैं, जिनमें अकेले पंजाब प्रांत में तीन प्रमुख कमांड (रावलपिंडी, मंगला और मुल्तान) स्थित हैं।

यदि चार प्रांतों को खत्म करके 20 से 30 या 160 नई प्रशासनिक इकाइयों में बदल दिया जाता है, तो कानून-व्यवस्था और प्रशासन की निगरानी के नाम पर सेना को कई नए थ्री-स्टार लेफ्टिनेंट जनरल कमांड स्थापित करने का कानूनी आधार मिल जाएगा। यह व्यवस्था पाकिस्तानी सेना के भीतर महत्वाकांक्षी मेजर जनरलों के लिए प्रमोशन के नए रास्ते खोलने और सेना के आंतरिक असंतोष को दबाने का सबसे मुफीद जरिया बनेगी। अवाम के सामने इसे भले ही 'प्रशासनिक सुगमता और जनसुविधा' का मुलम्मा चढ़ाकर पेश किया जा रहा हो, लेकिन हकीकत में यह उस संस्था के बेलगाम विस्तार का ब्लूप्रिंट है जो परदे के पीछे से पूरे मुल्क की कमान अपने हाथ में रखना चाहती है।