चीन की बैसाखी के सहारे अंतरिक्ष की सैर करेंगे पाकिस्तानी एस्ट्रोनॉट

चीन की बैसाखी के सहारे अंतरिक्ष की सैर करेंगे पाकिस्तानी एस्ट्रोनॉट

अंतरिक्ष विज्ञान और आधुनिक प्रौद्योगिकी के इस स्वर्णिम युग में जहां एक तरफ दुनिया के तमाम शक्तिशाली देश चंद्रमा और मंगल ग्रह पर अपनी बस्तियां बसाने की होड़ में जुटे हैं, वहीं दूसरी तरफ पड़ोसी देश पाकिस्तान अंतरिक्ष के सफर के लिए भी पूरी तरह से चीन की मेहरबानी और उसकी तकनीकी बैसाखी का मोहताज नजर आ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया गलियारों से सामने आई एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाली खबर के अनुसार, पाकिस्तान अपने एक अंतरिक्ष यात्री को अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी तो कर रहा है, लेकिन इसके पीछे पूरी फंडिंग, तकनीक और रॉकेट चीन का होगा। इतना ही नहीं, चीन अपने इस 'मेहमान' अंतरिक्ष यात्री को अंतरिक्ष में केवल एक हफ्ते तक ही रखकर वापस धरती पर धकेल देगा, जिसके बाद से सोशल मीडिया पर पाकिस्तान की इस स्पेस एजेंसी और उसकी अंतरिक्षीय महत्त्वाकांक्षाओं का जमकर मजाक उड़ाया जा रहा है। दुनिया के तमाम वैज्ञानिक इस बात पर हैरानी जता रहे हैं कि अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में दशकों पीछे चल रहा पाकिस्तान अपनी खुद की क्षमता विकसित करने के बजाय किस तरह चीन के कंधे पर बंदूक रखकर अपनी असफलताओं पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा है।

अपनी तकनीक के अभाव में चीन के स्पेस प्रोग्राम पर पूरी तरह निर्भर हुआ कंगाल पाकिस्तान

आज के समय में अंतरिक्ष तकनीक किसी भी देश की आर्थिक, सामरिक और वैज्ञानिक शक्ति का सबसे बड़ा पैमाना मानी जाती है, जिसे हासिल करने के लिए इसरो (ISRO), नासा (NASA) और सीएसए जैसी संस्थाएं वर्षों की कड़ी मेहनत और स्वदेशी अनुसंधान करती हैं। इसके विपरीत, पाकिस्तान की अंतरिक्ष एजेंसी 'सुपरको' (SUPARCO) अपनी स्थापना के इतने दशकों बाद भी आज तक कोई भी स्वतंत्र स्वदेशी रॉकेट या उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। स्थिति यह आ चुकी है कि अब पाकिस्तान को अपनी तथाकथित 'अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष उड़ान' के लिए भी पूरी तरह से ड्रैगन यानी चीन के स्पेस स्टेशन और उसके अंतरिक्ष मिशनों के आगे हाथ फैलाने पड़ रहे हैं। बीजिंग द्वारा प्रायोजित इस स्पेस मिशन के तहत पाकिस्तानी एस्ट्रोनॉट को चीनी राकेट और चीनी कैप्सूल के जरिए अंतरिक्ष में भेजा जाएगा, जहां वह केवल कुछ ही दिन गुजारकर वापस लौट आएगा। इस प्रकार की परोपकारी उड़ानों से भले ही पाकिस्तान अपनी जनता को अंतरिक्ष में पहुंचने का झूठा सपना दिखाने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि यह अंतरिक्ष विज्ञान के नाम पर केवल एक राजनीतिक दिखावा और चीन का एहसान तले दबने की कहानी है।

महज सात दिन की मेहमाननवाजी और अंतरिक्ष में पाकिस्तान का यह सबसे छोटा और लाचार स्पेस सफर

आम तौर पर अंतरिक्ष मिशनों में जाने वाले अंतरिक्ष यात्री महीनों तक अंतरिक्ष स्टेशन पर रहकर वैज्ञानिक प्रयोग, माइक्रोग्रैविटी रिसर्च और तकनीकी परीक्षण करते हैं, जिससे उनके देश को भविष्य के लिए अमूल्य वैज्ञानिक डेटा प्राप्त होता है। लेकिन चीन द्वारा पाकिस्तान को दिए जा रहे इस विशेष अवसर के तहत उनका अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में केवल एक हफ्ता यानी सात दिन ही बिता पाएगा, जिसके तुरंत बाद उसे वापस जमीन पर लौटने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। इतने कम समय में न तो कोई गंभीर वैज्ञानिक प्रयोग संभव है और न ही किसी प्रकार की अंतरिक्ष तकनीक में महारत हासिल की जा सकती है, जिसके कारण दुनिया भर के अंतरिक्ष विशेषज्ञ इसे एक 'पर्यटन यात्रा' या 'प्रचार स्टंट' से ज्यादा कुछ नहीं मान रहे हैं। चीन की मेहरबानी पर अंतरिक्ष की सैर करने जा रहे इस पाकिस्तानी एस्ट्रोनॉट का यह सफर इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि देश की चरमराती अर्थव्यवस्था और दिवालिया हो चुके खजाने के कारण अब अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे खर्चीले क्षेत्रों में भी पाकिस्तान पूरी तरह दूसरों की दया पर निर्भर हो चुका है।

चीन के इस एहसान के पीछे छिपा भू-राजनीतिक जाल और ड्रैगन की साम्राज्यवादी कूटनीति

अंतरराष्ट्रीय मामलों और सामरिक विशेषज्ञों का यह मानना है कि चीन कभी भी बिना किसी गहरे स्वार्थ या भू-राजनीतिक फायदे के किसी भी देश पर इस प्रकार की मेहरबानी नहीं बरसाता है। पाकिस्तान को अंतरिक्ष की सैर कराना दरअसल चीन की उस 'सॉफ्ट पावर' कूटनीति का एक बहुत बड़ा हिस्सा है, जिसके जरिए वह अपने इस सदाबाहर सहयोगी देश को अपनी तकनीक और आर्थिक नीतियों का पूरी तरह से गुलाम बनाए रखना चाहता है। सीपैक (CPEC) जैसे प्रोजेक्ट्स के बाद अब अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी पाकिस्तान को पूरी तरह अपने अधीन करके चीन यह साबित करना चाहता है कि इस क्षेत्र में उसका ही एकछत्र साम्राज्य है। पाकिस्तानी हुक्मरान भले ही अपनी जनता को यह दिखाने की कोशिश कर रहे हों कि वे अंतरिक्ष युग में प्रवेश कर चुके हैं, लेकिन हकीकत यह है कि वे चीन के हाथों की एक ऐसी कठपुतली बन चुके हैं जो अपनी हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए बीजिंग की तरफ ताकने को मजबूर हैं।

आत्मनिर्भरता के युग में दूसरों की बैसाखी के सहारे चलने की मजबूरियां और देश का भविष्य

आज जब भारत का चंद्रयान और गगनयान मिशन पूरी दुनिया में अपनी स्वदेशी तकनीक, कम लागत और शानदार सफलताओं के लिए इतिहास रच रहा है, तब दूसरी तरफ पाकिस्तान का यह हाल यह सोचने पर मजबूर करता है कि गलत नीतियों और आतंकवाद को पालने वाले देश भविष्य की दौड़ में किस तरह पिछड़ जाते हैं। स्वदेशी तकनीक और अपने वैज्ञानिकों की मेहनत के बिना कोई भी देश अंतरिक्ष जैसी महान ऊंचाइयों को नहीं छू सकता, भले ही वह दूसरों के पैसों और रॉकेट पर बैठकर कुछ दिनों के लिए आसमान की सैर ही क्यों न कर ले। पाकिस्तान के इस एक हफ्ते के अंतरिक्ष नाटक ने एक बार फिर से यह उजागर कर दिया है कि बैसाखी के सहारे चलने वाले देश कभी अपनी रफ्तार से नहीं दौड़ सकते। जब तक पाकिस्तान अपनी प्राथमिकताओं को बदलकर शिक्षा, विज्ञान और तकनीक पर ध्यान नहीं देगा, तब तक उसकी गिनती हमेशा दूसरों की मेहरबानी पर जीने वाले देशों में ही होती रहेगी।