हिंदू और ईसाइयों के बाद अब पाकिस्तान में 'मुसलमानों' पर भी जुल्म, दफनाने को दो गज जमीन तक नहीं

हिंदू और ईसाइयों के बाद अब पाकिस्तान में 'मुसलमानों' पर भी जुल्म, दफनाने को दो गज जमीन तक नहीं

पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों—विशेषकर हिंदू और ईसाई समुदायों—पर होने वाले अत्याचारों और मानवाधिकार उल्लंघनों की खबरें अक्सर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में बनी रहती हैं। लेकिन अब इस्लामी गणराज्य पाकिस्तान से एक ऐसा कड़वा और खौफनाक सच सामने आया है जिसने दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों को सन्न कर दिया है। पाकिस्तान में अब केवल गैर-मुस्लिम ही नहीं, बल्कि खुद को मुसलमान मानने वाले कई अल्पसंख्यक फिरकों और समुदायों के लोग भी भीषण सामाजिक, कानूनी और धार्मिक प्रताड़ना का शिकार हो रहे हैं। हालात इस कदर बदतर हो चुके हैं कि इन इंसानों को जीते जी तो नागरिक अधिकारों और सम्मान से महरूम रखा ही जा रहा है, मरने के बाद उन्हें दफनाने तक के लिए दो गज जमीन तक नसीब नहीं हो रही है। शवों को दफनाने के दौरान होने वाले हमले, कब्रिस्तानों की बेअदबी और मौलवियों के फतवों ने कट्टरपंथ के उस अंधेरे चेहरे को उजागर कर दिया है जो अब अपने ही नागरिकों को निगल रहा है।

कट्टरपंथ की आग में झुलसता पाकिस्तान और अल्पसंख्यक मुस्लिम फिरके

पाकिस्तान की सामाजिक और कानूनी संरचना में कट्टरपंथी विचारधारा का प्रभाव इस कदर हावी हो चुका है कि धर्म की परिभाषा तय करने का ठेका कट्टरपंथी मौलवियों और असहिष्णु संगठनों ने अपने हाथों में ले लिया है। देश में अहमदिया (Ahmadiyya) समुदाय, शिया (Shia) समुदाय और कई सूफी परंपराओं से जुड़े लोगों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। विशेष रूप से 1974 के संविधानात्मक संशोधन के जरिए अहमदिया समुदाय को कानूनी रूप से 'गैर-मुस्लिम' घोषित कर दिए जाने के बाद से उनके खिलाफ संस्थागत प्रताड़ना का दौर शुरू हुआ था जो आज अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुका है। जब ये लोग खुद को इस्लाम के सिद्धांतों से जुड़ा हुआ मानते हैं और अपनी धार्मिक इबादत करते हैं, तो उन पर तुरंत ईशनिंदा कानून (Blasphemy Laws) और हिंसा का चाबुक चला दिया जाता है, जिससे इनका दैनिक जीवन एक खौफनाक बुरे सपने में बदल गया है।

मरने के बाद भी राहत नहीं: दफनाने के लिए तरसते शव और छिनती जमीन

मानवता को शर्मसार करने वाली सबसे दर्दनाक तस्वीर उस समय सामने आती है जब किसी परिवार में किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है। पीड़ित परिवारों का आरोप है कि स्थानीय कट्टरपंथी तत्व और उग्र भीड़ उन्हें आम मुस्लिम कब्रिस्तानों में अपने प्रियजनों के शवों को दफनाने से रोक देती है। कई मौकों पर तो जनाजे की नमाज तक नहीं पढ़ने दी जाती और परिजनों के साथ मारपीट की जाती है। यदि कोई परिवार छिपकर या किसी तरह शव को दफना भी देता है, तो बाद में उग्र भीड़ कब्रों को खोदकर शवों को बाहर निकाल फेंकती है और कब्र के पत्थरों (Grave Markers) पर लिखे पवित्र आयतों को मिटा देती है। किसी भी सभ्य समाज में मृतक के अंतिम संस्कार को एक बुनियादी मानवीय अधिकार माना जाता है, लेकिन पाकिस्तान में धार्मिक असहिष्णुता ने इस अंतिम अधिकार को भी छीन लिया है और लोग अपनों की मय्यत लेकर दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

कानून की खामोशी और राज्य प्रायोजित प्रताड़ना का शिकार

इस पूरे मानवीय संकट में सबसे दुखद पहलू यह है कि देश की पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था पीड़ितों की रक्षा करने के बजाय अक्सर उग्र भीड़ और कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक देती है। कई मामलों में तो पुलिस खुद आगे बढ़कर कब्रों से धार्मिक प्रतीकों को हटाने और कब्रिस्तानों की दीवारें गिराने में उपद्रवियों का साथ देती नजर आती है ताकि इलाके में 'शांति' बनी रहे। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब कानून के रखवाले ही भेदभावपूर्ण रवैया अपनाने लगें, तो न्याय की गुंजाइश पूरी तरह से खत्म हो जाती है। अदालतें भी ऐसे संवेदनशील मामलों में कट्टरपंथियों के दबाव में आ जाती हैं, जिससे पीड़ित परिवारों को कानूनी लड़ाई लड़ने की भी हिम्मत नहीं होती और वे अपने ही देश में दोयम दर्जे के नागरिक बनकर जीने को विवश हैं।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बेनकाब होता पाकिस्तान का दोहरा रवैया

यह खौफनाक स्थिति पाकिस्तान के उस दोहरे रवैये की पोल खोलती है जो वह दुनिया भर के सामने पेश करने की कोशिश करता है। एक तरफ जहां पाकिस्तान की हुकूमत वैश्विक मंचों पर जाकर अन्य देशों में मुसलमानों के अधिकारों पर लंबे-चौड़े भाषण देती है और इस्लामोफोबिया के खिलाफ आवाज उठाने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ उसके अपने ही मुल्क में खुद को मुसलमान कहने वाले अल्पसंख्यकों और अन्य धार्मिक समुदायों को कब्र में दफन होने की जगह तक नहीं दी जाती। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) ने अपनी रिपोर्टों में बार-बार पाकिस्तान को इस मानवाधिकार उल्लंघन के लिए फटकार लगाई है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में कोई बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है।

सामाजिक विखंडन और भयावह भविष्य की ओर बढ़ता देश

धार्मिक कट्टरता, असहिष्णुता और अपनों पर ही हो रहे इस जुल्म ने पाकिस्तान के सामाजिक ताने-बाने को अंदर से खोखला कर दिया है। जब किसी समाज में नफरत इस हद तक बढ़ जाए कि वह मृतकों की गरिमा का भी सम्मान न करे, तो उस समाज का पतन निश्चित माना जाता है। पाकिस्तान के बुद्धिजीवी और उदारवादी वर्ग भी अब इस हालात पर चिंता जता रहे हैं कि यदि इस अंध-कट्टरपंथ पर लगाम नहीं लगाई गई, तो यह आग केवल अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे देश को अपनी चपेट में ले लेगी। फिलहाल, पाकिस्तान में अपने प्रियजनों को खोने वाले सैकड़ों परिवार इस बात से खौफजदा हैं कि मरने के बाद उनके अपनों को शांति से आराम करने के लिए दो गज जमीन नसीब होगी भी या नहीं।