भारत और अफगानिस्तान के बाद अब ईरान युद्ध में टांग अड़ाकर बुरी तरह फंसा पाकिस्तान

भारत और अफगानिस्तान के बाद अब ईरान युद्ध में टांग अड़ाकर बुरी तरह फंसा पाकिस्तान

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर आज यदि किसी देश की नीतियों को सबसे बड़ी विफलताओं का जीवंत उदाहरण माना जा रहा है, तो वह पाकिस्तान है जो एक साथ कई मोर्चों पर अपनी ही बुनी हुई साजिशों के जाल में उलझता चला जा रहा है। पूर्वी सीमा पर भारत के कड़े कूटनीतिक रुख और पश्चिमी सीमा पर तालिबान शासित अफगानिस्तान के साथ लगातार सुलगते सीमा विवादों के बीच अब पाकिस्तान ने पश्चिम एशिया में भड़के ईरान युद्ध के बीच अपनी गैर-जरूरी दखलंदाजी करके अपने लिए एक नया और भयानक संकट मोल ले लिया है। पड़ोसी देशों के साथ दशकों से शत्रुतापूर्ण रवैया अपनाने वाला और आतंकवाद को अपनी विदेश नीति का हथियार बनाने वाला यह देश अब अपने ही फैसलों के कारण एक ऐसे भू-राजनीतिक चक्रव्यूह में फंस चुका है जहाँ से निकलना उसकी सरकार के लिए नामुमकिन सा प्रतीत होता है। इस बीच, देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से रसातल में जा चुकी है, विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो चुका है, और पाकिस्तान की आम अवाम यानी जनता महंगाई, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में बुरी तरह हलकान होकर सड़कों पर त्रिाहि-त्रिाहि कर रही है।

भारत की सख्त कूटनीति और अफगानिस्तान के साथ बिगड़ते सीमाई समीकरणों ने बढ़ाई पाकिस्तान की मुश्किलें

पाकिस्तान के हुक्मरानों की यह पुरानी फितरत रही है कि वे अपनी घरेलू विफलताओं और विफल अर्थव्यवस्था से जनता का ध्यान भटकाने के लिए हमेशा पड़ोसी देशों के खिलाफ उकसावे की कार्रवाई करते रहते हैं। एक तरफ भारत ने दुनिया के मंचों पर आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया है और किसी भी प्रकार की बातचीत से तब तक इनकार कर दिया है जब तक सीमा पार आतंकवाद पूरी तरह बंद नहीं होता, तो दूसरी तरफ कभी पाकिस्तान के सामरिक 'स्रातेजिक डेप्थ' कहे जाने वाले अफगानिस्तान के साथ भी उसके रिश्ते अब पूरी तरह से दुश्मनी में बदल चुके हैं। डूरंड लाइन पर लगातार हो रही सैन्य झड़पों और अफगान तालिबान द्वारा पाकिस्तानी चौकियों पर किए जाने वाले हमलों ने यह साबित कर दिया है कि इस्लामाबाद की नीतियां अब उसके अपने ही पड़ोसियों के गले की फांस बन चुकी हैं। क्षेत्रीय स्तर पर पूरी तरह से घिर चुके पाकिस्तान के पास अब अपने ही पाले हुए भूतों का सामना करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है।

ईरान युद्ध में अनावश्यक टांग अड़ाने की गलती से मिडिल ईस्ट के देशों की नाराजगी का शिकार हुआ इस्लामाबाद

अपनी तमाम आंतरिक और बाहरी समस्याओं से जूझ रहे पाकिस्तान के नेतृत्व ने हाल ही में पश्चिम एशिया में छिड़े ईरान युद्ध और तनावपूर्ण हालातों के दौरान ऐसी कूटनीतिक चालें चल दीं, जिसने उसे ईरान और अन्य खाड़ी देशों की नजरों में पूरी तरह से गिरा दिया है। अंतरराष्ट्रीय दबाव और विदेशी वित्तीय पैकेजों के लालच में आकर जिस तरह से पाकिस्तानी हुक्मरानों ने परोक्ष या अपरोक्ष रूप से पश्चिम एशिया के संघर्ष में अपनी भूमिका निभाने की कोशिश की, उससे तेहरान और अन्य क्षेत्रीय ताकतों का गुस्सा भड़क उठा है। सामरिक विशेषज्ञों का मानना है कि जो देश खुद आईएमएफ (IMF) के कर्ज और भीख के कटोरे पर जिंदा हो, यदि वह मध्य पूर्व के जटिल और खतरनाक युद्धों में मध्यस्थता या कूटनीतिक चालबाजी करने की कोशिश करेगा, तो उसका हश्र ऐसा ही होना तय है। इस प्रकार की बचकानी और अदूरदर्शी विदेश नीति के कारण आज पाकिस्तान के पास पश्चिम एशिया में भी कोई सच्चा मित्र नहीं बचा है और वह हर तरफ से अविश्वास का सामना कर रहा है।

महंगाई, भुखमरी और बिजली संकट से त्रस्त पाकिस्तानी अवाम का फूटा गुस्सा, देश के भीतर गृहयुद्ध जैसे हालात

सीमाओं पर चौतरफा घिरने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार हो रही फजीहत का सबसे भयानक और सीधा असर पाकिस्तान की आम जनता यानी अवाम पर पड़ रहा है जो रोजमर्रा की दो जून की रोटी के लिए भी संघर्ष करने को मजबूर हो चुकी है। देश में आटे, दाल, पेट्रोल और जीवन रक्षक दवाओं के दाम आसमान छू रहे हैं, जबकि उद्योग धंधे बंद होने के कारण बेरोजगारी अपने चरम पर पहुंच चुकी है। बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और सिंध जैसे प्रांतों में सरकार और पाकिस्तानी सेना के खिलाफ स्थानीय नागरिकों का गुस्सा अब सशस्त्र विद्रोह और बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों के रूप में फूट पड़ा है। जनता का साफ कहना है कि देश के हुक्मरान अपनी नाकाबिलियत को छुपाने के लिए युद्ध जैसे हालात पैदा कर रहे हैं, जबकि आम आदमी की जिंदगी नर्क बन चुकी है। देश के भीतर सुलगती असंतोष की यह आग इस बात का संकेत दे रही है कि आने वाले समय में पाकिस्तान का आंतरिक ढांचा और अधिक तेजी से बिखर सकता है।

अपनी ही बुनी साजिशों के जाल में फंस चुके पाकिस्तान के लिए भविष्य का अंधकारमय और डरावना दौर

इतिहास इस बात गवाह है कि जो देश दूसरों के लिए खाई खोदते हैं, वे खुद उसी में सबसे पहले गिरते हैं, और आज पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति इस सत्य का सबसे सटीक उदाहरण बन चुकी है। भारत के साथ दुश्मनी मोल लेने, अफगानिस्तान के साथ सीमा विवाद बढ़ाने और अब पश्चिम एशिया के युद्ध में बेवजह टांग अड़ाने की इन मूर्खतापूर्ण नीतियों ने पाकिस्तान को दुनिया के नक्शे पर एक 'फेल स्टेट' की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है। वहां की फौज और हुक्मरान भले ही अपनी नाकामी को छुपाने के लिए झूठे प्रोपेगेंडा का सहारा लेते रहें, लेकिन सच यह है कि देश आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक रूप से पूरी तरह से दिवालिया हो चुका है। जब तक पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को पनाह देना बंद नहीं करता और क्षेत्रीय शांति की दिशा में ईमानदार कदम नहीं उठाता, तब तक उसकी अवाम का यह हाल और अधिक बदतर होता चला जाएगा।