पाकिस्तान को मिली कर्ज लेने वाले देशों के बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म की अध्यक्षता
वैश्विक अर्थव्यवस्था में गहराते वित्तीय संकट और लगातार बढ़ते कर्ज के बोझ के बीच एक अत्यंत अभूतपूर्व राजनीतिक और आर्थिक घटनाक्रम सामने आया है। आर्थिक मोर्चे पर लंबे समय से घिरे और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) व विश्व बैंक की शर्तों से जूझ रहे पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र (UN) समर्थित विकासशील कर्जदार देशों के संगठन 'बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म' (Borrowers' Platform) के गवर्निंग काउंसिल की कमान सौंप दी गई है। थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में आयोजित विश्व बैंक और IMF की वार्षिक बैठकों के दौरान पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने आधिकारिक रूप से इस अध्यक्षता को स्वीकार किया। 30 से अधिक विकासशील देशों वाले इस क्लब का अध्यक्ष बनने के बाद अब इस्लामाबाद वैश्विक मंचों पर कर्जदार राष्ट्रों की सामूहिक आवाज बनने की कोशिश करेगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या कर्ज में डूबा पाकिस्तान खुद दूसरों की राह आसान कर पाएगा या यह महज एक कूटनीतिक औपचारिकता है?
जानिए क्या है संयुक्त राष्ट्र समर्थित 'बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म' और इसका मुख्य उद्देश्य
संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की देखरेख में गठित यह 'बॉरोअर्स प्लेटफॉर्म' मुख्य रूप से वैश्विक दक्षिण (Global South) के उन देशों का एक अंतरराष्ट्रीय समूह है, जो भारी विदेशी कर्ज और ऊंची ब्याज दरों की दोहरी मार झेल रहे हैं। वर्तमान में कई विकासशील राष्ट्र अपनी कुल राजस्व आय का लगभग 9.5 प्रतिशत से अधिक हिस्सा केवल पुराने कर्जों के ब्याज चुकाने में खर्च कर रहे हैं, जो पिछले दो दशकों में सबसे उच्चतम स्तर है। ऐसे माहौल में यह प्लेटफॉर्म सदस्य देशों को आपस में तकनीकी सहयोग, डेटा साझाकरण, आर्थिक सुधारों के अनुभव और कर्ज प्रबंधन की रणनीतियों का आदान-प्रदान करने का अवसर प्रदान करता है। इसका प्राथमिक मकसद इन राष्ट्रों को वित्तीय संकट से बाहर निकालने के लिए एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने और अंतरराष्ट्रीय उधारदाताओं के सामने मजबूत रणनीतिक स्थिति बनाने योग्य बनाना है।
कितना शक्तिशाली है UN का यह बॉरोअर्स क्लब और क्या हैं इसकी सीमाएं?
इस नए मंच की शक्तियों और प्रभाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विश्लेषकों के बीच मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक तरफ जहां इसे विकासशील देशों के लिए एक सामूहिक वार्ता मंच के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसकी अपनी कूटनीतिक सीमाएं भी हैं। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह प्लेटफॉर्म पेरिस क्लब या पश्चिमी लेनदारों के सामने कोई कठोर दबाव समूह (Cartel) नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों जैसे IMF या विश्व बैंक के फैसलों पर सीधे तौर पर कोई कानूनी या बाध्यकारी वीटो पावर नहीं रखता। हालांकि, इसकी असली ताकत इसकी सामूहिक गोलबंदी में छिपी है। 30 से अधिक देशों का यह समूह एक साथ मिलकर वैश्विक कर्ज संरचना में पारदर्शिता, ब्याज दरों में राहत, और संकटग्रस्त देशों के लिए पुनर्गठन (Debt Restructuring) की अनुकूल शर्तों की जोरदार वकालत कर सकता है।
पाकिस्तान को कमान मिलने के मायने और वैश्विक आर्थिक समीकरणों पर प्रभाव
पाकिस्तान के पास पिछले कई दशकों से विदेशी कर्जों, बेलआउट पैकेजों और पुनर्गठन वार्ताओं का एक लंबा अनुभव रहा है। यही कारण है कि इसे इस मंच की कमान सौंपी गई है ताकि यह अपने व्यावहारिक अनुभवों से अन्य देशों को मार्गदर्शन प्रदान कर सके। हालांकि, पाकिस्तान के अपने घरेलू अर्थशास्त्र की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। पाकिस्तान के भीतर और बाहर कई आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि जो देश स्वयं विदेशी सहायता और लगातार मिलने वाले राहत पैकेजों पर निर्भर है, उसके लिए अन्य देशों का मार्गदर्शन करना एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती होगी। फिर भी, इस्लामाबाद के लिए यह एक बड़ा अवसर है कि वह वैश्विक वित्त व्यवस्था के प्रमुख नीति निर्माताओं के साथ सीधे संपर्क में रहकर अपनी आर्थिक साख को सुधारने की कोशिश करे और विकासशील देशों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी रणनीतिक छाप छोड़े।