होर्मुज स्ट्रेट खोलने और बातचीत के प्रस्ताव को डोनाल्ड ट्रंप ने क्यों ठुकराया
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर इस समय पश्चिम एशिया के सुलगते रेगिस्तान से एक बहुत बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने दुनिया भर के रणनीतिकारों और वैश्विक बाजारों की सांसें थाम दी हैं। ईरान ने रणनीतिक रूप से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग माने जाने वाले होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) को पूरी तरह से खोलने और अमेरिका के साथ तमाम पुराने विवादों को भुलाकर सीधी बातचीत करने का एक बड़ा कूटनीतिक प्रस्ताव वाशिंगटन के सामने रखा था। लेकिन दुनिया को हैरान करते हुए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए तेहरान के इस पांसे को पूरी तरह से पलट दिया। आखिर क्या वजह थी कि अमेरिका जैसे महाशक्ति देश ने इतनी बड़ी राहत देने वाले प्रस्ताव को ठुकराने में एक पल की भी देर नहीं लगाई और इसके पीछे पश्चिम एशिया के मौजूदा युद्ध तथा वैश्विक तेल अर्थव्यवस्था का कौन सा खतरनाक खेल छिपा हुआ है, आइए इस पूरी भू-राजनीतिक उलझन को बेहद गहराई से समझते हैं।
होर्मुज स्ट्रेट का वैश्विक महत्व और दुनिया की आर्थिक धमनियों पर मंडराता तेल संकट का साया
फारस की खाड़ी के मुहाने पर स्थित होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे संकीर्ण और रणनीतिक रूप से संवेदनशील जलमार्गों में शुमार है, जिसके रास्ते से होकर पूरी दुनिया का बीस प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस गुजरती है। जब भी पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है या ईरान इस मार्ग को बंद करने की धमकी देता है, तो पूरी दुनिया के शेयर बाजारों में भूचाल आ जाता है और पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छूने लगते हैं। ईरान द्वारा इस जलमार्ग को खोलने और अमेरिकी प्रतिबंधों पर बातचीत करने का प्रस्ताव देना इस बात का संकेत था कि तेहरान की अर्थव्यवस्था पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का दबाव अब असहनीय होता जा रहा था। ईरान यह अच्छी तरह जानता था कि यदि उसने इस लाइफलाइन को बाधित रखा, तो उसे न केवल अपने तेल निर्यात से हाथ धोना पड़ेगा, बल्कि दुनिया भर के अन्य देश भी उसके खिलाफ एक होकर किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए मजबूर हो जाएंगे।
डोनाल्ड ट्रंप का आक्रामक रुख और ईरान के बातचीत के प्रस्ताव को ठुकराने की असली रणनीतिक वजह
जब ईरान का यह प्रस्ताव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टेबल पर पहुंचा, तो विश्लेषकों का मानना था कि शायद कूटनीति को एक मौका दिया जाएगा, लेकिन ट्रंप के सख्त तेवरों ने सभी संभावनाओं को खारिज कर दिया। डोनाल्ड ट्रंप और उनके शीर्ष सुरक्षा सलाहकारों का यह मानना था कि ईरान इस प्रकार के प्रस्तावों के जरिए केवल समय का पहिया घुमाना चाहता है ताकि वह अपनी परमाणु गतिविधियों को आगे बढ़ाने और क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क्स को पुनर्गठित करने के लिए वक्त हासिल कर सके। ट्रंप प्रशासन की नीति हमेशा से 'मैक्सिमम प्रेशर' यानी अधिकतम दबाव की रही है, और उनका साफ कहना है कि जब तक ईरान आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं करता और अपनी विस्तारवादी नीतियों का त्याग नहीं करता, तब तक किसी भी सशर्त बातचीत या रियायत का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। इस दो टूक इनकार ने यह साबित कर दिया है कि अमेरिका ईरान पर अपनी आर्थिक और सामरिक पकड़ को और अधिक मजबूत करना चाहता है।
वैश्विक महाशक्तियों के इस शह-मात के खेल में तेल बाजारों और एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की बढ़ती चिंताएं
अमेरिका और ईरान के बीच चल रही इस तनातनी का सबसे बुरा असर दुनिया भर के उन विकासशील देशों पर पड़ रहा है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह से मध्य पूर्व के कच्चे तेल पर निर्भर हैं। भारत, चीन और कई अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाएं इस बात को लेकर बेहद चिंतित हैं कि यदि होर्मुज स्ट्रेट पर असमंजस की स्थिति बनी रही या संघर्ष और अधिक फैला, तो ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर एक बहुत बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। ईरान का यह प्रस्ताव ठुकराए जाने के बाद अब इस बात की आशंका और अधिक बढ़ गई है कि तेहरान बौखलाहट में आकर इस समुद्री मार्ग को आंशिक या पूर्ण रूप से बाधित करने का कोई खतरनाक कदम उठा सकता है। वैश्विक शेयर बाजारों में इस भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण निवेशकों के बीच डर का माहौल है और कमोडिटी मार्केट में लगातार उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है।
आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया के हालात और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिए एक बड़ी चुनौती
डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के प्रस्ताव को ठुकराए जाने के बाद अब यह साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया का यह संघर्ष और अधिक तीव्र तथा जटिल रूप धारण कर सकता है। कूटनीतिक रास्ते बंद होने के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव की आशंकाओं से पूरी दुनिया के शांतिप्रिय देश सहमे हुए हैं, क्योंकि एक छोटी सी चिंगारी भी पूरे क्षेत्र को बारूद के ढेर में बदल सकती है। इतिहास गवाह है कि युद्ध और अहंकार के इस खेल में अंततः सबसे बड़ी कीमत आम जनता और वैश्विक अर्थव्यवस्था को ही चुकानी पड़ती है। यह देखना बेहद दिलचस्प और चिंताजनक होगा कि क्या दुनिया के अन्य देश इस गतिरोध को समाप्त करने के लिए कोई वैकल्पिक मध्यस्थता की राह निकाल पाते हैं या फिर यह महासंग्राम दुनिया को एक नए और अनजाने आर्थिक संकट की ओर धकेल देता है।