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केंद्र सरकार पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ रिश्तों की एक नई शुरुआत करने की पहल कर रही है। इसके तहत नीमराना डायलॉग को नए सिरे से आगे बढ़ाने के संकेत दिए गए हैं। इस पहल के अंतर्गत पूर्व भारतीय राजनयिक, सेना के वरिष्ठ अधिकारी और शिक्षा जगत की बड़ी हस्तियां पाकिस्तान का यात्री पर गई थीं और उन्होंने भारत-पाक के रिश्तों पर बात की। भारत की तरफ से इस दल का प्रतिनिधित्व पूर्व विदेश सचिव और पाकिस्तान विशेषज्ञ विवेक काटजू और पूर्व एनसीईआरटी प्रमुख जेएस राजपूत ने किया था। यह बातचीत 28 अप्रैल से 30 अप्रैल के बीच हुई।

 

पाकिस्तान की तरफ से इस डायलॉग का प्रतिनिधित्व पूर्व विदेश सचिव इनाम उल हक और इशरत हुसैन सहित अन्य लोगों ने किया था।

आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि इस बार पाकिस्तान को गैर सरकारी वार्ता की मेजबानी करनी थी लेकिन इस्लामाबाद ने इसे मंजूरी देने से मना कर दिया था जिससे मीटिंग का आयोजन पहले नहीं हो सका। दरअसल मीटिंग के लिए मंजूरी न देकर पाकिस्तान अपनी नाराजगी दिखाना चाहता था। पाकिस्तान भारत के उस स्टैंड को लेकर खफा है जिसके तहत भारत पाकिस्तान से तब तक कोई आधिकारिक वार्ता के पक्ष में नहीं है जब तक भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने वालों पर पाकिस्तान नकेल नहीं कसता है। लेकिन बाद में पाकिस्तान ने नीमराना डायलॉग पर आगे बढ़ने का फैसला किया। 

क्या है नीमराना डायलॉग

नीमरामा एक ऐसी बातचीत है जिसमें सरकार सीधे तौर पर शामिल नहीं होती है। पहले भी इस तरह की वार्ता की कोशिशें हो चुकी हैं लेकिन पहले के मुकाबले इसमें थोड़ा फर्क यह है कि अतीत में दोनों देशों के विदेश मंत्रालय भी इससे जुड़ा करते थे, मगर अब ऐसा नहीं है। इस्लामाबाद के साथ किसी भी तरह की आधिकारिक बातचीत करने से पहले भारत आगामी चुनावों के नतीजों का इंतजार कर रहा है।

पहली बार दोनों देशों के बीच इस तरह की बातचीत 1991-1992 में नीमराना के किले में हुई थी और इसी कारण इसका नाम नीमराना डायलॉग पड़ा है। तब से दोनों तरफ के गैर सरकारी प्रतिनिधि दोनों देशों के संबंधों को सुधारने पर बातचीत करते हैं। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल दो नीमराना ग्रुप के सदस्य रहे हैं उन्होंने बातचीत के लिए पाकिस्तान ना जाने का फैसला लिया था। हालांकि उनका कहना है कि नीमराना बहुत महत्वपूर्ण बातचीत है और इसने कई बार मुश्किल दौर में रिश्तों को बचाया है।

 

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