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Up kiran,Digital Desk : मध्य पूर्व में जारी भीषण युद्ध के बीच एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पूरी दुनिया की धड़कनें बढ़ा दी हैं। चर्चा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के परमाणु ठिकानों के मलबे में दबे 450 किलोग्राम से ज्यादा संवर्धित (Enriched) यूरेनियम को निकालने के लिए अमेरिकी विशेष बलों को भेजने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जानकारों का मानना है कि अमेरिका इस यूरेनियम को सुरक्षित रूप से अपने कब्जे में लेने के लिए एक बेहद गुप्त और जटिल ऑपरेशन की योजना बना रहा है।

परमाणु बम बनाने की दहलीज पर ईरान: क्या है 60% शुद्धता का राज?

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के प्रमुख राफेल ग्रोसी के अनुसार, ईरान के पास इस समय लगभग 440 किलोग्राम यूरेनियम है, जिसे 60 प्रतिशत तक शुद्ध किया जा चुका है। परमाणु हथियार बनाने के लिए 90 प्रतिशत शुद्धता की आवश्यकता होती है, और ईरान इस लक्ष्य के बेहद करीब है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह मात्रा 10 से अधिक परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त है। वर्तमान में यह बेशकीमती और खतरनाक भंडार इस्फहान और नतांज फैसिलिटी के मलबे के नीचे दबा हुआ है, जो पिछले साल अमेरिकी और इजरायली हमलों में तबाह हो गए थे।

मलबे से यूरेनियम निकालना: अमेरिकी सेना के सामने हिमालय जैसी चुनौती

भले ही अमेरिका ने 1994 में 'प्रोजेक्ट सफायर' के तहत कजाकिस्तान से 600 किलो यूरेनियम निकाला था, लेकिन ईरान में स्थिति बिल्कुल अलग है। यहाँ यूरेनियम दुश्मन के इलाके में और मलबे के नीचे है। इस मिशन को अंजाम देने के लिए अमेरिकी सेना को बड़े पैमाने पर खुदाई करनी होगी, जिसके लिए हजारों सैनिकों और परमाणु विशेषज्ञों की जरूरत होगी। सबसे बड़ी चुनौती एक सुरक्षित रनवे तैयार करने की है, ताकि भारी कार्गो विमानों के जरिए इस रेडियोधर्मी पदार्थ को सुरक्षित निकाला जा सके। यह पूरी प्रक्रिया महीनों लंबी और बेहद खतरनाक हो सकती है।

क्या इतिहास दोहराएगा अमेरिका? प्रोजेक्ट सफायर की यादें ताजा

साल 1994 में अमेरिका ने बेहद खामोशी से कजाकिस्तान से वेपन ग्रेड यूरेनियम निकालकर दुनिया को चौंका दिया था। लेकिन आज ईरान के साथ युद्ध की स्थिति में ऐसा करना किसी बड़े जोखिम से कम नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ट्रंप इस योजना पर आगे बढ़ते हैं, तो यह आधुनिक सैन्य इतिहास का सबसे जटिल 'रिकवरी ऑपरेशन' होगा। ईरान की ओर से होने वाले संभावित पलटवार और रेडियोधर्मी रिसाव का खतरा इस मिशन को और भी ज्यादा घातक बनाता है।