Up kiran,Digital Desk : दिल्ली के कथित शराब घोटाले (Excise Policy Case) को लेकर आम आदमी पार्टी (AAP) और न्यायपालिका के बीच टकराव एक नए और अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया है। दिल्ली हाई कोर्ट की जज जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक को जवाब दाखिल करने का 'अंतिम मौका' दिया है, लेकिन 'आप' नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया है कि उनका 'अदालती बहिष्कार वाला सत्याग्रह' जारी रहेगा।
अदालत में क्या हुआ? (जस्टिस शर्मा का रुख)
बुधवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत में न तो अरविंद केजरीवाल के वकील पहुंचे और न ही मनीष सिसोदिया या दुर्गेश पाठक की ओर से कोई पक्ष रखा गया।
जज की चेतावनी: जस्टिस शर्मा ने कहा कि कई पक्षों ने जवाब दाखिल कर दिए हैं, लेकिन कुछ ने अभी तक ऐसा नहीं किया है। अदालत ने उन्हें शनिवार तक जवाब दाखिल करने का 'एक और आखिरी मौका' दिया है।
सोमवार से सुनवाई: जज ने निर्देश दिया कि केस से संबंधित सारा रिकॉर्ड गुरुवार तक मंगवा लिया जाए और सोमवार से इस मामले की नियमित सुनवाई शुरू की जाएगी।
AAP का जवाब: 'जहां न्याय की उम्मीद नहीं, वहां पेश क्यों हों?'
पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा ने साफ कर दिया है कि केजरीवाल और अन्य नेता इस कानूनी कार्यवाही का हिस्सा नहीं बनेंगे। उन्होंने इसके पीछे 'सत्याग्रह' का तर्क दिया:
सत्याग्रह जारी है: ढांडा ने कहा कि यह फैसला सोच-समझकर लिया गया है। जब हमें पता है कि एक विशेष अदालत से इंसाफ नहीं मिलेगा, तो वहां पेश होने का कोई फायदा नहीं है।
परिणाम की चिंता नहीं: "हम राजघाट गए थे और यह प्रण लिया था कि हम किसी भी दुष्परिणाम के लिए तैयार हैं।"
रिक्यूजल (Recusal) की मांग: आप नेताओं का आरोप है कि उन्होंने जज से खुद को मामले से अलग करने का अनुरोध किया था, लेकिन जब उन्होंने इससे इनकार कर दिया, तो अब बहिष्कार ही एकमात्र रास्ता बचा है।
विवाद की जड़: क्यों हो रहा है बहिष्कार?
यह पूरा मामला 20 अप्रैल को शुरू हुआ जब जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने केजरीवाल और सिसोदिया की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उनसे इस केस की सुनवाई से खुद को अलग करने की मांग की गई थी।
हितों का टकराव: केजरीवाल ने जस्टिस शर्मा पर हितों के टकराव के आरोप लगाए हैं।
खुला पत्र: आप नेताओं ने एक खुला पत्र लिखकर घोषणा की थी कि वे व्यक्तिगत रूप से या वकील के माध्यम से इस अदालत में पेश नहीं होंगे।
न्याय पर आशंका: आप का दावा है कि वर्तमान परिस्थितियों में उन्हें इस अदालत से निष्पक्ष सुनवाई की उम्मीद नहीं है।
क्या होगा अगर केजरीवाल पेश नहीं हुए?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कोई पक्ष अदालत के 'अंतिम मौके' के बावजूद पेश नहीं होता है, तो:
एकतरफा फैसला (Ex-parte): अदालत बिना बचाव पक्ष को सुने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अपना फैसला सुना सकती है।
अवमानना: बार-बार आदेश की अनदेखी को अदालत की अवमानना (Contempt of Court) के रूप में भी देखा जा सकता है।




