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Up kiran,Digital Desk : उत्तर प्रदेश के टोल प्लाजा पर 1 अप्रैल से कैशलेस व्यवस्था (Cashless Toll) अनिवार्य करने के दावों के बीच पहले दिन जबरदस्त अफरा-तफरी और असमंजस का माहौल रहा। लखनऊ और आसपास के जिलों के टोल प्लाजा पर दिनभर वाहन चालकों और टोल कर्मियों के बीच तीखी नोकझोंक होती रही। सबसे बड़ा विवाद आधिकारिक नोटिफिकेशन (Official Notification) को लेकर था, जिसे दिखाने में टोल प्रबंधक नाकाम रहे।

ग्राउंड रिपोर्ट: लखनऊ के प्रमुख टोल प्लाजा का हाल

दैनिक जागरण की टीम ने रायबरेली, सीतापुर, बाराबंकी और उन्नाव रूट के टोल प्लाजा पर पड़ताल की, जहाँ अव्यवस्थाओं का अंबार मिला:

मामपुर इटौंजा टोल (सीतापुर रोड): यहाँ टोल कर्मियों ने नकद लेने से साफ मना कर दिया, जिससे वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। जब यात्रियों ने आदेश की कॉपी मांगी, तो प्रबंधक रवि और कर्मी अरुण कुमार 'मुख्यालय का निर्देश' कहकर टालमटोल करते रहे।

दखिना शेखपुर टोल (रायबरेली रोड): यहाँ प्रबंधक ने दावा किया कि अधिसूचना NHAI मुख्यालय में है। हालांकि, तकनीकी दिक्कतों और फास्टैग में बैलेंस न होने के कारण अंत में 1% लोगों से नकद लेकर ही मामला सुलझाया गया।

अहमदपुर टोल (बाराबंकी): यहाँ अयोध्या जा रहे यात्रियों ने व्यवस्था को तो सराहा, लेकिन अचानक लागू करने पर नाराजगी जताई। लोगों का तर्क था कि बिना प्रचार-प्रसार के सीधे नकद बंद करना गलत है।

नवाबगंज टोल (उन्नाव): यहाँ टोल प्रबंधक दीपक यादव ने बताया कि वे केवल डिजिटल भुगतान के लिए 'काउंसलिंग' कर रहे हैं। यहाँ करीब 4% लोगों ने नकद भुगतान किया।

विवाद की मुख्य वजह: आदेश की कॉपी न होना

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की बैठक के मिनट्स के अनुसार, कैशलेस व्यवस्था 15 अप्रैल तक पूरी तरह लागू करने का लक्ष्य है। लेकिन 1 अप्रैल से ही इसे 'अनिवार्य' बताकर लागू करने की कोशिश ने विवाद खड़ा कर दिया।

चालकों का तर्क: "जब तक टोल बूथ पर सरकारी आदेश चस्पा नहीं होगा, हम नकद भुगतान का विकल्प क्यों छोड़ें?"

टोल कर्मियों की मजबूरी: लंबी कतारें और बहस बढ़ने पर उन्हें पीछे खड़े वाहनों (जैसे अभिषेक शुक्ला और महातम) के गुस्से का सामना करना पड़ा, जिसके कारण कई जगह मजबूरन कैश लेना पड़ा।

तकनीकी खामियां और डिजिटल विकल्प

FASTag फेलियर: ट्रक चालक हरिदास जैसे कई लोगों के फास्टैग में बैलेंस होने के बावजूद मशीन ने उसे रीड नहीं किया, जिससे उन्हें यूपीआई (UPI) का सहारा लेना पड़ा।

UPI/QR कोड: जिन चालकों के पास फास्टैग नहीं था, उनमें से अधिकांश ने क्यूआर कोड स्कैन कर भुगतान किया। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के चालकों को ऑनलाइन पेमेंट में खासी दिक्कत आई।