Up Kiran,Digital Desk: भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुआ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) एक ऐतिहासिक कदम है, जो न केवल इन दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी को मजबूत करता है, बल्कि वैश्विक व्यापार और राजनीति पर भी गहरा असर डालने वाला है। हालांकि, जहां एक ओर यह समझौता विकास और सहयोग का प्रतीक माना जा रहा है, वहीं कुछ वैश्विक ताकतों के लिए यह नया सौदा परेशानी का कारण बन सकता है। विशेष रूप से अमेरिका की प्रतिक्रिया ने इसे और दिलचस्प बना दिया है।
अमेरिका का विरोध: क्या यूरोपीय देशों के लिए रूस से आर्थिक जुड़ाव को लेकर नये सवाल खड़े हो रहे हैं?
अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने यूरोपीय देशों पर तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया है कि यूरोप भारत से जो रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद खरीदता है, उनमें पश्चिमी देशों द्वारा प्रतिबंधित रूसी कच्चे तेल का उपयोग हो रहा है। उनका कहना है कि इस व्यापारिक गतिविधि के चलते रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों का असर कमजोर पड़ रहा है, जिससे रूस को अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक लाभ हो रहा है।
बेसेंट ने यूरोपीय नीतियों में विरोधाभास की ओर इशारा करते हुए कहा कि जब एक ओर यूरोपीय नेता सार्वजनिक मंचों पर यूक्रेन के समर्थन की बात करते हैं, तो दूसरी ओर इन व्यापारिक सौदों के जरिए रूस पर दबाव बनाने की रणनीति कमजोर हो रही है। इस स्थिति को वे यूरोप के लिए आत्मघाती मानते हैं, क्योंकि यह रूस के खिलाफ जारी संघर्ष को ही अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक रूप से मदद पहुंचा रहा है।
क्या यूरोप 'अपनी ही जंग' को फंड कर रहा है?
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यूरोप इन ट्रेड डील्स के माध्यम से उस संघर्ष को प्रोत्साहित कर रहा है, जो खुद यूरोप के लिए सबसे बड़ा संकट बन चुका है। उनका मानना है कि रूस पर आर्थिक दबाव डालना पश्चिमी देशों का मुख्य उद्देश्य था, लेकिन यूरोपीय व्यापार रणनीतियां इस दबाव को कमजोर कर रही हैं। यह एक नई जटिलता उत्पन्न करता है, क्योंकि यूरोप की आर्थिक नीतियां न केवल रूस को राहत पहुंचा रही हैं, बल्कि पश्चिमी गठबंधन की रणनीतियों से भी टकरा रही हैं।
भारत-यूरोपीय संघ समझौता: एक नई शुरुआत?
इन आरोपों के बावजूद, भारत और यूरोपीय संघ ने अपने इस फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को एक ऐतिहासिक और दूरगामी कदम के रूप में पेश किया है। लगभग 20 सालों की लंबी बातचीत के बाद यह समझौता अस्तित्व में आया, जो भारत के लिए अपने 19वें व्यापारिक समझौते का हिस्सा बन गया है। इससे भारतीय व्यापार को यूरोपीय बाजारों में अपनी पैठ बनाने में मदद मिलेगी, और घरेलू उद्योगों के लिए भी प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलेगा।
इस समझौते से दोनों पक्षों को एक दूसरे के बाजारों में खुला और प्रतिस्पर्धात्मक रूप से प्रवेश करने का मौका मिलेगा, जिससे भारत का निर्यात भी तेज़ी से बढ़ने की उम्मीद है। यह न केवल आर्थिक साझेदारी का एक नया अध्याय खोलता है, बल्कि दोनों देशों के बीच विश्वास और रणनीतिक गठबंधन को भी मजबूत करता है।
अमेरिका के 'अमेरिका फर्स्ट' सिद्धांत को झटका
यह सब उस वक्त हुआ है, जब अमेरिका अपनी घरेलू व्यापार नीतियों को लेकर कई मुश्किलों का सामना कर रहा है। अमेरिका ने हाल ही में उच्च टैरिफ और कमजोर आपूर्ति श्रृंखलाओं के कारण कई देशों के साथ व्यापारिक तनाव बढ़ा लिया है। ऐसे में भारत और यूरोपीय संघ का यह समझौता अमेरिका की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के लिए एक बडी चुनौती साबित हो सकता है। विशेष रूप से ट्रम्प प्रशासन के दौरान उठाए गए कड़े कदमों से इस नई डील का विरोध करना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
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