img

Up Kiran, Digital Desk: बिहार की सियासत में दशकों से जातिगत समीकरण केंद्र में रहा है। यहाँ कुशवाहा, मल्लाह, मांझी जैसी छोटी जातियाँ भी अपने मजबूत नेताओं के साथ एक अलग पहचान बनाकर उभरती रही हैं। इन सबके बीच, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बड़े अपवाद के तौर पर सामने आते हैं। पिछले बीस सालों में नीतीश कुमार ने अपनी कुर्मी जाति (जो राज्य की आबादी का तीन प्रतिशत भी नहीं है) की सीमा से बाहर निकलकर एक ऐसा व्यापक जातीय ताना-बाना बुना है जो उनके व्यक्तिगत प्रभाव पर टिका है। यह उनकी असाधारण राजनीतिक शक्ति का प्रमाण है क्योंकि राज्य के अन्य प्रमुख नेता आज भी अपने जातिगत आधार तक सिमटे हुए हैं।

जाति का दायरा और नीतीश का विस्तार

आज की बिहार की राजनीति देखें तो आरजेडी के तेजस्वी यादव को मुख्य रूप से यादव समुदाय का प्रतिनिधि माना जाता है। वहीं चिराग पासवान (लोजपा-रा.वि.) दुसाध समुदाय के नेता के तौर पर जाने जाते हैं। भाजपा के दिग्गज नेता गिरिराज सिंह भूमिहार और सम्राट चौधरी कुशवाहा समुदाय से आते हैं।

लेकिन नीतीश कुमार का समीकरण इन सबसे अलग है। उनकी व्यापक लोकप्रियता इसलिए भी खास है क्योंकि कुर्मी होने के बावजूद उन्हें जातिगत मोर्चे पर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। इसके बावजूद उनका ठोस पिछड़ा वर्ग वोट आधार—खासकर अति-पिछड़े वर्गों (EBCs) के बीच—उनके प्रति पूरी तरह वफादार बना हुआ है।

EBC की अटूट वफादारी

पटना से उत्तर-पूर्व के सीमांचल क्षेत्र में घूमकर देखने पर यह वफादारी साफ नजर आती है। बाढ़, सिकंदरा और कटिहार जैसे इलाकों के मतदाता विकास कार्यों को प्राथमिकता दे रहे हैं। एक मतदाता ने तो साफ कहा "जो हमको सड़क दिया बिजली दिया सुरक्षा दिया उसको नहीं वोट देंगे तो किसे देंगे?"

धनुख समुदाय के साथ-साथ दलित समुदायों जैसे पासवान और मांझी के लोग भी नीतीश के प्रति अपनी निष्ठा दिखा रहे हैं।

यह तब है जब इन समुदायों के प्रमुख नेता (चिराग पासवान जीतन राम मांझी) भी एनडीए गठबंधन का हिस्सा हैं।

कई मंडल समुदाय के लोग भी स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि वे स्थानीय उम्मीदवार की जगह सीधे "नीतीश बाबू" के लिए मतदान करेंगे।

मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार ने EBCs को मजबूत करने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। उन्होंने 2006 में पंचायत चुनावों में EBC के लिए बीस प्रतिशत आरक्षण को मंजूरी दी। 2010 में उन्होंने EBC के लिए एक नई उद्यमिता योजना शुरू की जिसके तहत छोटे व्यवसाय लगाने के लिए दस लाख तक की सहायता दी गई। हाल ही में 2023 में हुए बिहार जाति सर्वेक्षण में EBC की आबादी छत्तीस प्रतिशत बताई गई।

बदलाव के संकेत?

हालांकि कुछ क्षेत्रों में नीतीश थकान के हल्के संकेत भी मिल रहे हैं। जमुई जैसे स्थानों पर कुछ कहारों (चंद्रवंशी) ने अपनी नाराजगी जाहिर की है। एक ई-रिक्शा मालिक ने पुलिस द्वारा बीपीएससी उम्मीदवार लाठीचार्ज की घटना का हवाला देते हुए आरजेडी नेता तेजस्वी यादव को सत्ता में लाने की इच्छा जताई। जमुई में आरजेडी के पारंपरिक मुस्लिम और यादव वोटों के साथ-साथ कुछ अन्य वर्गों के समर्थन से बीजेपी की श्रेयसी सिंह के मुकाबले आरजेडी के शमशाद आलम को लाभ मिल सकता है।

बिहार की सियासत में नीतीश का यह जादुई समीकरण उन्हें आज भी सबसे मजबूत खिलाड़ी बनाए हुए है मगर इस चुनाव में EBC का यह आधार कितना टिका रहेगा यह देखना दिलचस्प होगा।