Up Kiran, Digital Desk: प्रयागराज के संगम नगरी में इस समय माघ मेले का आयोजन चल रहा है, जहां हर दिन श्रद्धा और भक्ति से जुड़ी अनगिनत कहानियाँ बन रही हैं। इस मेले में देशभर से पहुंचे साधु-संतों की साधना और तपस्या, दर्शकों के लिए न केवल एक आध्यात्मिक अनुभव है, बल्कि ये समाज में आस्था के प्रति श्रद्धा और विश्वास को भी पुनः जागृत कर रहे हैं। खासतौर पर, श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े के नागा संन्यासी बाबा शंकरपुरी की कठिन साधना इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है।
एक पैर पर सात साल की तपस्या
माघ मेले में श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच बाबा शंकरपुरी की तपस्या ने सभी का ध्यान आकर्षित किया है। सीतापुर के नैमिषारण्य से आए बाबा शंकरपुरी पिछले सात वर्षों से एक ही पैर पर खड़े होकर अपनी 'खड़ेश्वरी' साधना में लीन हैं। यह उनका अद्वितीय समर्पण और आस्था का प्रतीक है, जो न केवल उन्हें आत्मिक संतुष्टि प्रदान करता है, बल्कि अन्य लोगों को भी आस्था और धैर्य के महत्व को समझाता है।
साधना का विशिष्ट तरीका
बाबा शंकरपुरी की साधना केवल शारीरिक कठिनाई नहीं है, बल्कि यह एक गहरी मानसिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया भी है। वे झूले का सहारा लेकर एक पैर पर खड़े रहते हैं, जिससे उनकी साधना में स्थिरता और आराम बनी रहती है। इसी स्थिति में वे भक्तों को दर्शन देते हैं और मोर पंख से उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हैं। बाबा का कहना है कि यह साधना जनकल्याण और परोपकार के उद्देश्य से की जा रही है। उनके अनुसार, यह तपस्या उन्हें अपने जीवन का उद्देश्य समझने और दूसरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में मदद करती है।
संन्यास की राह: एक 7 साल की यात्रा
बाबा शंकरपुरी का संन्यास जीवन एक प्रेरणा की तरह है। महज सात साल की उम्र में उन्होंने सांसारिक जीवन छोड़ दिया था और अपने आध्यात्मिक सफर की शुरुआत की। 2013 में प्रयागराज कुंभ के दौरान, उन्होंने जूना अखाड़े से दीक्षा लेकर नागा संन्यासी का मार्ग अपनाया। उनके जीवन में यह परिवर्तन गुरु श्री दिगंबर तोतापुरी जी महाराज के मार्गदर्शन से आया, जिनसे वे आज भी अपनी आध्यात्मिक यात्रा को दिशा देते हैं।
श्रद्धालुओं की आस्था और उनका आकर्षण
माघ मेला में आने वाले श्रद्धालु बाबा शंकरपुरी की तपस्या को देखकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं। उनका समर्पण और आस्थापूर्ण साधना लोगों को एक नई दिशा दिखाती है। श्रद्धालु अक्सर उनके पास आते हैं, उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और उनके साथ सेल्फी लेने की कोशिश करते हैं। बाबा इस सब को सहजता से स्वीकारते हैं और मुस्कराते हुए सभी को आशीर्वाद देते हैं। उनकी इस विनम्रता और तपस्या से लोग प्रभावित होते हैं और इस अनुभव को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं।




