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Up kiran,Digital Desk : न्यायिक व्यवस्था पर बढ़ते लंबित मामलों के दबाव को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने अहम फैसला लिया है। कॉलेजियम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में पांच सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को तदर्थ (एड-हॉक) जज के रूप में नियुक्त करने को मंजूरी दे दी है। ये नियुक्तियां संविधान के अनुच्छेद 224-A के तहत दो वर्षों की अवधि के लिए की जाएंगी।

क्यों लिया गया यह फैसला?

कॉलेजियम ने साफ किया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट देश के सबसे अधिक लंबित मामलों वाले न्यायालयों में शामिल है। ऐसे में अस्थायी तौर पर अनुभवी रिटायर्ड जजों की नियुक्ति से पुराने और लंबे समय से अटके मामलों की सुनवाई तेज हो सकेगी। तदर्थ जज नियमित जजों की तरह ही पीठ में बैठकर मामलों की सुनवाई करेंगे।

कम इस्तेमाल हुआ संवैधानिक प्रावधान फिर हुआ सक्रिय

अनुच्छेद 224-A संविधान में पहले से मौजूद है, लेकिन इसका उपयोग अब तक बहुत सीमित रहा है। बढ़ते केस बोझ को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को फिर से प्रभावी रूप से लागू करने का फैसला किया है, ताकि न्याय मिलने में हो रही देरी को कम किया जा सके।

अनुच्छेद 224-A क्या कहता है?

इस अनुच्छेद के तहत किसी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश को अस्थायी जज के रूप में नियुक्त करने का अनुरोध कर सकते हैं। ऐसे जजों को वही अधिकार और शक्तियां मिलती हैं, जो नियमित न्यायाधीशों को प्राप्त होती हैं।

इन पांच रिटायर्ड जजों को मिली मंजूरी

कॉलेजियम की 3 फरवरी की बैठक में जिन नामों पर मुहर लगी, वे हैं—

जस्टिस मोहम्मद फैज आलम खान

जस्टिस मोहम्मद असलम

जस्टिस सैयद आफताब हुसैन रिजवी

जस्टिस रेनू अग्रवाल

जस्टिस ज्योत्स्ना शर्मा

इन सभी को इलाहाबाद हाईकोर्ट में तदर्थ जज के तौर पर नियुक्त किया जाएगा।

लंबित मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का रुख

सुप्रीम कोर्ट पहले भी हाईकोर्टों में लंबित मामलों को लेकर चिंता जता चुका है। अप्रैल 2021 में अदालत ने करीब 57 लाख लंबित मामलों को “डॉकेट एक्सप्लोजन” करार दिया था। उसी दौरान रिटायर्ड जजों की तदर्थ नियुक्ति के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए थे।

कितनी संख्या तक हो सकती है तदर्थ नियुक्ति?

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी भी हाईकोर्ट में तदर्थ जजों की संख्या कुल स्वीकृत न्यायाधीशों की संख्या के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। इसका उद्देश्य यह है कि अस्थायी व्यवस्था सहायक बने, न कि नियमित न्यायिक ढांचे का विकल्प।