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Up Kiran, Digital Desk: अमेरिका में इस वक़्त एक बड़ा संवैधानिक संकट खड़ा हो गया है। एक तरफ़ देश की अदालत है, जो कानून और संविधान की रक्षा करती है, और दूसरी तरफ़ हैं राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो अपने फ़ैसलों को सबसे ऊपर मानते हैं। हाल ही में एक अमेरिकी अदालत ने ट्रंप द्वारा लगाए गए व्यापारिक टैरिफ़ (एक तरह का टैक्स) को "असंवैधानिक" यानी गैरकानूनी क़रार दे दिया, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने इस फ़ैसले को मानने से साफ़ इनकार कर दिया है।

अदालत ने क्यों कहा 'ये असंवैधानिक है'?

अमेरिकी अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा कि राष्ट्रपति को इस तरह से एकतरफ़ा और मनमाने ढंग से टैरिफ़ लगाने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार देश की संसद (कांग्रेस) के पास है। अदालत का मानना था कि ट्रंप ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया है और यह देश के संविधान के ख़िलाफ़ है। यह फ़ैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी जीत थी जो शुरुआत से ही इन टैरिफ़ का विरोध कर रहे थे और इसे "व्यापार युद्ध" (Trade War) की शुरुआत मान रहे थे।

ट्रंप का जवाब: 'फ़ैसला ग़लत, टैरिफ़ जारी रहेंगे'

अदालत के इस फ़ैसले के कुछ ही घंटों बाद, राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी प्रतिक्रिया दी और पूरे मामले को और गरमा दिया। उन्होंने कहा, "यह एक ग़लत फ़ैसला है। हमारे देश के हितों की रक्षा करना मेरा काम है। टैरिफ़ जैसे थे, वैसे ही लागू रहेंगे।"

ट्रंप के इस बयान ने अमेरिका में एक बड़ी बहस छेड़ दी है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या देश के राष्ट्रपति ख़ुद को क़ानून से ऊपर मान सकते हैं? जब देश की एक अदालत किसी चीज़ को गैरकानूनी बता रही है, तो राष्ट्रपति उसे लागू रखने पर कैसे अड़े रह सकते हैं?

अब आगे क्या होगा :यह टकराव अब अमेरिका के लोकतंत्र की एक बड़ी परीक्षा बन गया है। मामला अब शायद सुप्रीम कोर्ट तक जाएगा, जो यह तय करेगा कि आख़िरी फ़ैसला किसका मान्य होगा - राष्ट्रपति का या अदालत का। इस पूरे घटनाक्रम पर सिर्फ़ अमेरिका ही नहीं, बल्कि भारत समेत पूरी दुनिया की नज़रें टिकी हुई हैं, क्योंकि ट्रंप के इन टैरिफ़ का असर वैश्विक व्यापार पर पड़ता है। यह घटना हमेशा याद रखी जाएगी, जब एक राष्ट्रपति और देश की न्यायपालिका आमने-सामने आ गए थे।

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