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Up Kiran,Digital Desk: उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू होने के एक साल पूरा होने पर राज्य ने इसे एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना है। इस विशेष दिन को 'समान नागरिक संहिता दिवस' के रूप में मनाते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जनता को बधाई दी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की दिशा में शुरू हुआ यह पहल सिर्फ एक कानून नहीं, बल्कि समता, पारदर्शिता और सामाजिक एकता की बुनियाद है।

मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर इस कदम की सराहना करते हुए लिखा, "यूसीसी का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को उनके कानूनी अधिकारों में बराबरी दिलाना है। विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार जैसे मुद्दों पर महिलाएं अब बिना किसी भेदभाव के अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकेंगी।"

महिलाओं को मिली कानूनी समानता और न्याय

मुख्यमंत्री धामी ने बताया कि पिछले एक साल में यूसीसी के तहत राज्य में विवाह पंजीकरण और नागरिक सेवाओं के लिए प्रक्रियाओं में तेजी आई है। इसके साथ ही, 23 भाषाओं में सहायता और एआई आधारित सपोर्ट से यह सुनिश्चित किया गया कि हर नागरिक को इस परिवर्तन का पूरा लाभ मिले।

समान नागरिक संहिता में हालिया संशोधन: एक नया अध्याय

इससे पहले, सोमवार को यूसीसी में एक महत्वपूर्ण संशोधन किया गया, जिसे राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने मंजूरी दी। संशोधन के तहत, 1973 की आपराधिक प्रक्रिया संहिता को बदलकर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) 2023 और दंडात्मक प्रावधानों के लिए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) 2023 को लागू किया गया है।

इसके साथ ही, विवाह के दौरान दी गई गलत जानकारी को अब विवाह निरस्तीकरण का कारण माना जाएगा। विवाह और लिव-इन संबंधों में किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी, दबाव या अवैध कार्यों के लिए सख्त दंडात्मक प्रावधान सुनिश्चित किए गए हैं। लिव-इन संबंधों की समाप्ति के बाद पंजीयक द्वारा समाप्ति प्रमाण पत्र जारी करने की व्यवस्था भी लागू की गई है।

यूसीसी का समाज पर प्रभाव और भविष्य की दिशा

यूसीसी के तहत विवाह, तलाक और उत्तराधिकार संबंधी पंजीकरण में बदलाव ने समाज में एक नई जागरूकता उत्पन्न की है। खासकर महिलाओं के लिए यह एक सकारात्मक कदम साबित हुआ है, क्योंकि उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया गया है।

अब पंजीयक जनरल को विवाह, तलाक और लिव-इन संबंधों से संबंधित पंजीकरण को निरस्त करने का अधिकार दिया गया है। साथ ही, 'विधवा' शब्द के स्थान पर 'जीवनसाथी' शब्द को अपनाया गया है, जिससे समाज में एक नया दृष्टिकोण उत्पन्न हो सकता है।