दिवाली पूजा में भूलकर भी न करें ये 3 गलतियां! उल्टे पैर लौट जाएंगी मां लक्ष्मी, जान लें मूर्तियों के गुप्त नियम

दिवाली पूजा में भूलकर भी न करें ये 3 गलतियां! उल्टे पैर लौट जाएंगी मां लक्ष्मी, जान लें मूर्तियों के गुप्त नियम

दीपावली के महापर्व का सबसे पावन और मुख्य केंद्र बिंदु मां लक्ष्मी का पूजन होता है। शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक (या आश्विन अमावस्या) की इस रात्रि देवी लक्ष्मी स्वयं भूलोक पर भ्रमण करती हैं और जिस घर में स्वच्छता, प्रकाश और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है, वहां स्थाई रूप से निवास करती हैं। इस वर्ष लक्ष्मी पूजन रविवार, 8 नवंबर 2026 को पूरे विधि-विधान से संपन्न किया जाएगा। पूजन का सबसे शुभ समय शाम 6:00 बजे से लेकर रात 8:33 बजे तक रहेगा। इस दौरान माता लक्ष्मी के साथ विघ्नहर्ता भगवान गणेश, विद्या की देवी मां सरस्वती और धन के देवता भगवान कुबेर की विशेष आराधना की जाती है।

लक्ष्मी पूजन में मूर्तियों के चयन और उनकी स्थापना की दिशा को लेकर विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य माना जाता है। पूजा स्थल पर कभी भी मां लक्ष्मी की दो मूर्तियां नहीं रखनी चाहिए और न ही उनकी अकेली प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए; उनके साथ भगवान गणेश और देवी सरस्वती का होना आवश्यक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूजा के लिए रखी जाने वाली प्रतिमा में मां लक्ष्मी को कमल पर बैठी हुई मुद्रा और प्रसन्नचित्त भाव में होना चाहिए। इस बात का ध्यान रखें कि उनके हाथों से गिरते हुए सोने के सिक्के किसी पात्र में संचित हो रहे हों, न कि सीधे जमीन पर बिखर रहे हों। प्रतिमाओं में भगवान गणेश मां लक्ष्मी के दाईं ओर विराजमान होने चाहिए और स्थापित करते समय सभी देवी-देवताओं का मुख उत्तर दिशा की ओर रखना सर्वोत्तम फलदायी माना गया है।

पूजा की पूरी तैयारी के लिए जरूरी चीजें

पूजा की पूरी तैयारी के लिए आवश्यक सामग्रियों की एक संपूर्ण सूची तैयार रखना बेहद उपयोगी होता है ताकि ऐन वक्त पर कोई महत्वपूर्ण वस्तु छूट न जाए। पूजन सामग्री में लकड़ी की चौकी (पाटा), बिछाने के लिए लाल या पीला नया वस्त्र, कलश, आम के पत्ते, नारियल (श्रीफल), अक्षत (अखंडित चावल), हल्दी, कुमकुम, सिंदूर, चंदन, पान के पत्ते, सुपारी, लौंग, इलायची, धूप, अगरबत्ती, कपूर, घी, तेल, दीपक, रुई की बत्तियां, मौली (कलावा), यज्ञोपवीत (जनेऊ), इत्र, गंगाजल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर), गुड़, साबुत धनिया, जौ, गेहूं, दूर्वा, ताजे फूल, कमल के फूलों की माला, शंख, बैठने का आसन, पूजा की थाली, सोने या चांदी के सिक्के, सूखे मेवे, फल, पारंपरिक दिवाली नाश्ता (फराल), खील (लावा), बताशे और विविध नैवेद्य (भोग) शामिल हैं।

पूजन से पूर्व घर के मुख्य द्वार और आंगन की विशेष तैयारी की जाती है। घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर आम या अशोक के पत्तों और गेंदे के फूलों से बना तोरण बांधना शुभता का प्रतीक है। द्वार पर सुंदर रंगोली सजाई जाती है और नकारात्मकता दूर करने के लिए गंगाजल, हल्दी और कपूर के जल का छिड़काव किया जाता है। पूजा स्थल पर कुमकुम या सिंदूर से मांगलिक स्वास्तिक का निर्माण करें, जो भगवान गणेश की उपस्थिति और शुभ ऊर्जा के प्रवाह को सुनिश्चित करता है। रात के समय पूरे घर में प्रज्वलित किए जाने वाले तेल और शुद्ध घी के दीपक अंधकार पर प्रकाश की विजय का उद्घोष करते हैं और मां लक्ष्मी के स्वागत की राह प्रशस्त करते हैं, जिससे परिवार में आर्थिक संपन्नता, उत्तम स्वास्थ्य, मानसिक शांति और निरंतर सुख-समृद्धि बनी रहती है।