अगर मूल मंदिर जाना मुमकिन नहीं, तो घर पर ऐसे उतारें कुलदेवी की भूली हुई मन्नत; दूर होगा हर दोष

अगर मूल मंदिर जाना मुमकिन नहीं, तो घर पर ऐसे उतारें कुलदेवी की भूली हुई मन्नत; दूर होगा हर दोष

संकट के समय कुलदेवी या ईष्ट देव से मन्नत मांगना और कार्य सिद्ध होने के बाद भागदौड़ में उसे भूल जाना एक आम मानवीय भूल है। हालांकि, बाद में जब कोई अड़चन सामने आती है, तो मन में मन्नत अधूरी रहने का भय और अपराधबोध सताने लगता है। नवरात्रि का पावन पर्व इस प्रकार के दोषों के निवारण, प्रायश्चित और कुलस्वामिनी की कृपा पुनः प्राप्त करने का सर्वोत्तम अवसर माना जाता है। ज्योतिषी शिरीष कुलकर्णी के अनुसार, शास्त्रों में ऐसी स्थितियों से उबरने के बेहद स्पष्ट और सरल विधान बताए गए हैं।

यदि आपको अपनी मानी हुई मन्नत भली-भांति याद है- जैसे देवी को साड़ी-चोली अर्पित करना, पेड़े बांटना, पैदल यात्रा (वारी) करना अथवा विशेष अनुष्ठान कराना—तो इस नवरात्रि बिना किसी विलंब के उसे पूरा कर लें। कार्य पूर्ण करने के बाद देवी के समक्ष दोनों हाथ जोड़कर अनजाने में हुई देरी के लिए क्षमा याचना करें।

कई बार व्यक्ति को यह तो याद रहता है कि मन्नत मांगी थी, लेकिन स्वरूप याद नहीं रहता। ऐसी स्थिति में भयभीत होने के बजाय नवरात्रि में कुलदेवी के मूल पीठ (स्थान) जाकर शास्त्रीय विधि से क्षमा-प्रार्थना करनी चाहिए। मंदिर में देवी की पूरे विधि-विधान से 'ओटी' भरें, जिसमें खन (ब्लाउज पीस), साड़ी, हरी चूड़ियां, हल्दी-कुमकुम, सुपारी, सिक्का और श्रीफल अर्पित करें। इसके साथ ही मंगलसूत्र, बिछिया या नथ जैसी सौभाग्य सामग्री अर्पित करना अत्यंत शुभकारी माना जाता है। दर्शन के उपरांत अपनी सामर्थ्य अनुसार कन्याओं या जरूरतमंदों को भोजन कराएं और वस्त्र दान करें।

यदि भौगोलिक दूरी या किसी मजबूरी के चलते नवरात्रि में कुलदेवी के पैतृक मंदिर जाना संभव न हो, तो घर पर स्थापित घट अथवा कुलदेवी की प्रतिमा/टक के सम्मुख ही यह पूजा संपन्न करें। देवी को भोग और सुहाग सामग्री अर्पित करते हुए मानसिक रूप से भूल की क्षमा मांगें और परिस्थिति अनुकूल होते ही मूल मंदिर पहुंचकर मन्नत निवारण का संकल्प लें।