गणेश जी का स्त्री रूप भी है! जानिए क्यों प्रकट हुई थीं देवी विनायकी

गणेश जी का स्त्री रूप भी है! जानिए क्यों प्रकट हुई थीं देवी विनायकी

सनातन धर्म में किसी भी मांगलिक या शुभ कार्य का शुभारंभ भगवान श्री गणेश की आराधना और वंदना से करने की अटूट परंपरा है। रिद्धि-सिद्धि के दाता और विघ्नहर्ता भगवान गणेश को बुद्धि, विवेक, सुख और समृद्धि का कारक माना जाता है।

बप्पा के बाल गणेश, एकदंत, लंबोदर और विघ्नराज जैसे अनेक मनमोहक स्वरूपों से हर भक्त भली-भांति परिचित है। लेकिन हिंदू धर्म और पौराणिक इतिहास में भगवान गणेश का एक ऐसा भी परम दुर्लभ और रहस्यमयी स्वरूप वर्णित है, जिसके बारे में आज भी बहुत कम श्रद्धालु जानते हैं। यह अनूठा अवतार है भगवान गणेश का स्त्री रूप, जिसे धार्मिक ग्रंथों और प्राचीन मूर्तिकला में 'देवी विनायकी' के नाम से पूजा जाता है।

विनायकी, गणेश्वरी और गणेशानी: कई दिव्य नामों से विख्यात हैं देवी

भगवान गणेश के इस अलौकिक स्त्री स्वरूप को विभिन्न क्षेत्रों और प्राचीन ग्रंथों में अलग-अलग नामों से पुकारा गया है। इन्हें देवी विनायकी के अलावा गणेशानी, गणेश्वरी, गजाननी और विघ्नेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिव्य रूप की शारीरिक बनावट अत्यंत विस्मयकारी है, जिसमें शीश भगवान गणेश की तरह गज (हाथी) का है, जबकि शेष काया एक देवी यानी स्त्री रूप में सुशोभित है। पौराणिक और तंत्र परंपराओं में देवी विनायकी को आदिशक्ति मां दुर्गा की संहारक शक्ति और भगवान गणेश के बुद्धि-विवेक का अद्भुत संगम माना जाता है। भारत के कई सदियों पुराने ऐतिहासिक मंदिरों में इस अद्वितीय स्वरूप की नक्काशीदार और मनमोहक प्रतिमाएं आज भी विद्यमान हैं।

राजस्थान, ओडिशा और तमिलनाडु में स्थापित हैं प्राचीन दुर्लभ प्रतिमाएं

देवी विनायकी की पाषाण प्रतिमाएं भारत की समृद्ध पुरातात्विक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक हैं। राजस्थान के बाड़मेर जिले के प्राचीन खेड़ क्षेत्र में देवी विनायकी की एक अत्यंत दुर्लभ और प्राचीन मूर्ति स्थापित है। इसके साथ ही, ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के समीप स्थित प्रसिद्ध हीरापुर 64 योगिनी मंदिर में भी चौंसठ योगिनियों के समूह में देवी विनायकी की विशेष प्रतिमा प्रतिष्ठित है। वहीं सुदूर दक्षिण भारत में तमिलनाडु के कन्याकुमारी स्थित सुचिंद्रम के 1300 वर्ष से भी अधिक पुराने ऐतिहासिक 'थानुमालयन मंदिर' (स्थानुमालयन मंदिर) में एक नक्काशीदार खंभे पर देवी विनायकी की अद्भुत प्रतिमा उत्कीर्ण है, जिसे देखने दुनियाभर से शोधार्थी और श्रद्धालु पहुंचते हैं।

अंधकासुर वध से जुड़ा है प्राकट्य: जब वरदान बना देवताओं के लिए संकट

देवी विनायकी के प्राकट्य के पीछे पौराणिक धर्मग्रंथों में एक अत्यंत रोमांचक और रहस्यमयी गाथा मिलती है। कथा के अनुसार, दैत्यराज अंधकासुर अपनी असीम शक्तियों के घमंड में चूर होकर माता पार्वती का हरण करने की कुत्सित चेष्टा करने लगा। देवी की अस्मिता और ब्रह्मांड की मर्यादा की रक्षा के लिए देवाधिदेव महादेव शिव ने अपने त्रिशूल से अंधकासुर पर प्राणघातक प्रहार किया। परंतु अंधकासुर को यह वरदान प्राप्त था कि उसके शरीर से रक्त की जितनी भी बूंदें धरती पर गिरेंगी, हर बूंद से तुरंत उसके समान बलशाली और पराक्रमी नए राक्षस पैदा हो जाएंगे। युद्धभूमि में शिवजी के प्रहार के बाद जमीन पर रक्त गिरते ही असंख्य अंधकासुर प्रकट होने लगे, जिससे समस्त देवलोक में हाहाकार मच गया।

रक्त रोकने के लिए भगवान गणेश ने प्रकट की अपनी 'मातृ शक्ति'

दैत्यों की असीमित उत्पत्ति को रोकने और रक्त की बूंदों को जमीन पर गिरने से बचाने के लिए सभी प्रमुख देवी-देवताओं ने अपनी-अपनी आंतरिक शक्तियों का आह्वान किया, जिन्हें मातृकाएं कहा गया। उसी भीषण युद्ध के बीच विघ्नहर्ता भगवान गणेश ने भी अपने भीतर छिपी परम 'मातृ शक्ति' यानी स्त्री तत्व को जाग्रत किया। गणेश जी के इसी पराक्रमी स्त्री अवतार को 'देवी विनायकी' कहा गया। रणभूमि में उतरकर देवी विनायकी ने अपनी सूंड और शस्त्रों के प्रभाव से अंधकासुर के लहू की एक भी बूंद धरती पर नहीं गिरने दी और सारा रक्त पान कर लिया। रक्त के अभाव में दैत्यों का विस्तार थम गया और भगवान शिव ने सुगमता से पापी दानव अंधकासुर का वध कर दिया।