पत्थर से निकलते हैं संगीत के सात सुर, हम्पी के 56 खंभों का वो रहस्य जिसने आधुनिक विज्ञान के भी उड़ा दिए होश!
भारत की प्राचीन वास्तुकला ऐसे चमत्कारों से भरी है जो आज के आधुनिक विज्ञान को भी हैरान कर देती है। ऐसा ही एक नायाब नमूना कर्नाटक के हम्पी में तुंगभद्रा नदी के किनारे देखने को मिलता है। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल में शामिल विजया विट्ठल मंदिर अपनी बेजोड़ स्थापत्य कला के लिए दुनिया भर में मशहूर है। भगवान विष्णु के अवतार विट्ठल को समर्पित इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसके नक्काशीदार खंभे हैं, जिन्हें केवल उंगलियों या हथेली से थपथपाने पर संगीत के सात सुर गूंज उठते हैं। इसी खूबी की वजह से इन्हें 'म्यूजिकल पिलर्स' या सारेगामा पिलर्स कहा जाता है।
इस ऐतिहासिक मंदिर की नींव 15वीं सदी में विजयनगर साम्राज्य के शासक राजा देवराय द्वितीय के दौर में रखी गई थी। बाद में महान सम्राट कृष्णदेव राय ने इसे और अधिक भव्यता प्रदान करते हुए इसका विस्तार कराया। यूं तो परिसर में मौजूद विशाल पाषाण रथ सैलानियों को खूब लुभाता है, लेकिन मंदिर के महामंडप में बने 56 संगीतमय खंभे आकर्षण का मुख्य केंद्र हैं। इन खंभों की बनावट बेहद अनूठी है। हर मुख्य खंभे के चारों ओर सात छोटे-छोटे स्तंभ तराशे गए हैं। जब इन पर हल्की थाप दी जाती है, तो वीणा, मृदंगम, तबला और मंदिर की घंटियों जैसी मधुर ध्वनियां स्पष्ट सुनाई देती हैं।
दशकों तक यह माना जाता रहा कि शायद इन खंभों को अंदर से खोखला बनाकर कोई धातु या लकड़ी भरी गई होगी। हालांकि जब पुरातत्वविदों और भूवैज्ञानिकों ने आधुनिक उपकरणों से जांच की, तो वे दंग रह गए। ये खंभे पूरी तरह ठोस ग्रेनाइट पत्थरों को तराशकर बनाए गए हैं, जिनका अंदर से खोखला होने का कोई प्रमाण नहीं मिला। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान एक अंग्रेज अफसर ने इसके अंदर का राज जानने के लिए दो खंभों को बीच से कटवा भी दिया था, लेकिन अंदर सिर्फ ठोस पत्थर ही निकला। अंग्रेजों द्वारा काटे गए वे दोनों खंभे आज भी मंदिर परिसर में ऐतिहासिक गवाह के रूप में मौजूद हैं।
भूवैज्ञानिक शोधों के अनुसार, यह कोई जादू नहीं बल्कि विजयनगर साम्राज्य के शिल्पकारों की उन्नत धातु-विज्ञान और ध्वनिकी (Acoustics) की गहरी समझ का परिणाम है। इन खंभों को तराशने के लिए सामान्य ग्रेनाइट के बजाय सिलिका और लोहे जैसे खनिजों से भरपूर खास किस्म के पत्थरों का चयन किया गया था। इन पत्थरों की सघनता और विशेष कटाई की वजह से चोट पड़ने पर प्राकृतिक रूप से एक विशिष्ट फ्रीक्वेंसी का कंपन पैदा होता है, जो कानों में सुरीले संगीत के रूप में गूंजता है।