दान और दक्षिणा में क्या है अंतर; जानिए किसे, कब और कैसे देनी चाहिए दक्षिणा, क्या कहते हैं शास्त्र

दान और दक्षिणा में क्या है अंतर; जानिए किसे, कब और कैसे देनी चाहिए दक्षिणा, क्या कहते हैं शास्त्र

अक्सर हम सबने अपने बड़े-बुजुर्गों से 'दान' और 'दक्षिणा' जैसे शब्द सुने होंगे। पहली नजर में दोनों एक जैसे ही लगते हैं, और ज्यादातर लोग इन्हें एक ही मानकर गलती कर बैठते हैं। पर सच तो यह है कि इन दोनों शब्दों की गहराई और इनके मायने जमीन-आसमान का फर्क रखते हैं।

एक तरफ जहां दान का सीधा नाता इंसानियत और परोपकार से है, वहीं दूसरी तरफ दक्षिणा किसी के प्रति आभार जताने और उसका सम्मान करने का एक खूबसूरत जरिया है।

क्या है दान और दक्षिणा के बीच की असली दीवार?

अगर आसान भाषा में समझें तो दान किसी ऐसे शख्स को दिया जाता है जिसे वाकई मदद की दरकार हो, जैसे कोई गरीब या असहाय इंसान। इसका मकसद सिर्फ इतना होता है कि समाज के किसी जरूरतमंद का भला हो सके।

इसके उलट, दक्षिणा कोई मजबूरी या मदद नहीं है, बल्कि यह एक अदब भरी भेंट है। जब कोई ज्ञानी, पंडित, आचार्य या गुरु हमें कुछ सिखाता है या हमारे यहां कोई धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराता है, तो उसके बदले जो सम्मान दिया जाता है, उसे दक्षिणा कहते हैं। पुराने जमाने में जब छात्र अपनी शिक्षा पूरी करके गुरुकुल से विदा होते थे, तो वे गुरु को गुरु-दक्षिणा भेंट करते थे। यह असल में पढ़ाई की कोई फीस नहीं होती थी, बल्कि गुरु के उस ज्ञान और समर्पण के प्रति दिल से निकला हुआ शुक्रिया होता था।

दक्षिणा देने के कुछ जरूरी कायदे-कानून

हमारे शास्त्रों में दक्षिणा देने के भी कुछ कायदे बताए गए हैं। सबसे पहली बात तो यह कि दक्षिणा कभी भी बोझ समझकर या औपचारिकता निभाने के लिए नहीं दी जानी चाहिए। यह हमेशा खुले दिल और खुशी से दी जानी चाहिए।

  • श्रद्धा सबसे ऊपर: भेंट चाहे छोटी हो या बड़ी, उसमें आपकी भावना सच्ची होनी चाहिए।

  • योग्यता देखें: दक्षिणा हमेशा किसी विद्वान, नेक दिल और धर्म को समझने वाले व्यक्ति को ही दी जानी चाहिए।

  • दिखावे से बचें: कभी भी अपनी शोहरत बढ़ाने के लिए या अहंकार में आकर दक्षिणा न दें।

  • अपनी चादर देखकर पैर फैलाएं: आपकी जेब जितनी इजाजत दे, उतना ही दें। ऐसा कोई बंधन नहीं है कि दक्षिणा बहुत कीमती या भारी-भरकम ही होनी चाहिए।

दक्षिणा में क्या देना सही और क्या गलत?

आज के दौर में तो कैश यानी नकद पैसे देने का चलन सबसे ज्यादा है, क्योंकि पैसे को ही आज की जरूरत माना जाता है। लेकिन अगर पुराने वक्त की बात करें तो अन्न, गाय और भूमि जैसी चीजों को सबसे बड़ा और उत्तम माना जाता था। आप चाहें तो अपनी स्थिति के हिसाब से नए वस्त्र, ताजे फल, गुड़, तिल, सोने-चांदी की कोई चीज या फिर धार्मिक किताबें भी भेंट कर सकते हैं। वैसे, किताबें देना हमेशा से ही ज्ञान का प्रतीक माना गया है।

अब बात करते हैं उस चीज की जो भूलकर भी नहीं देनी चाहिए। दक्षिणा या भेंट में कभी भी फटे-पुराने कपड़े, टूटे हुए बर्तन, खंडित मूर्तियां या कोई भी खराब सामान नहीं देना चाहिए। खाने-पीने की चीजें दे रहे हैं, तो वो एकदम साफ और ताजी होनी चाहिए, बासी खाना कभी न दें। सबसे जरूरी बात यह है कि कभी भी ऐसा धन या सामान भेंट में न दें जो बेईमानी से कमाया गया हो या जिससे सामने वाले की आहत हो जाए। सम्मान की जगह अपमान कभी नहीं होना चाहिए।

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