जब दुबई और खाड़ी देशों पर चलता था भारत का सिक्का, हैरान कर देने वाला है गल्फ का ये भूला-बिसरा इतिहास
भारत ने लमसम 200 साल तक ब्रिटिश शासन की गुलामी झेली है और एक वक्त ऐसा भी था जब अंग्रेजी हुकूमत के विस्तार को लेकर कहा जाता था कि इसका सूर्य कभी नहीं डूबता। वक्त बदला, दुनिया के हालात सुधरे और आज भारत के खाड़ी देशों यानी मिडिल ईस्ट के साथ बेहद मजबूत और गहरे कूटनीतिक रिश्ते हैं।
आज लाखों भारतीय दुबई जैसे देशों में काम करते हैं और छुट्टियां मनाने जाते हैं। मगर क्या आप जानते हैं कि एक वक्त ऐसा भी था जब आज का दुबई और पूरा खाड़ी क्षेत्र लगभग भारत का ही हिस्सा हुआ करता था और यहां का पूरा शासन-प्रशासन दिल्ली से चलाया जाता था? आइए जानते हैं इस अनसुने और बेहद दिलचस्प इतिहास के बारे में।
20वीं सदी की शुरुआत में भारत के नियंत्रण में था अरब का एक-तिहाई हिस्सा
बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, समय के साथ लोग इस ऐतिहासिक सच को लगभग भूल चुके हैं, मगर 20वीं सदी की शुरुआत में अरब प्रायद्वीप का लगभग एक-तिहाई हिस्सा सीधे तौर पर ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य के अंतर्गत आता था। अदन से लेकर कुवैत तक, अरब के तमाम संरक्षित राज्यों का शासन दिल्ली से संचालित होता था।
इन क्षेत्रों की प्रशासनिक देखरेख 'इंडियन पॉलिटिकल सर्विस' के जिम्मे थी, इनकी सुरक्षा की कमान भारतीय सैनिकों के हाथों में थी और इन सभी की आधिकारिक जवाबदेही सीधे भारत के वायसराय के प्रति होती थी। कानूनी रूप से भी साल 1889 के 'इंटरप्रिटेशन एक्ट' के तहत इन सभी संरक्षित राज्यों को भारत का ही अभिन्न हिस्सा माना जाता था।
जब भारत की रियासतों में सबसे ऊपर दर्ज था अबू धाबी का नाम
इस इतिहास का एक और हैरान करने वाला पहलू यह है कि भारत की अर्ध-स्वतंत्र रियासतों की आधिकारिक सूची में 'अबू धाबी' का नाम अंग्रेजी वर्णमाला (Alphabetical Order) के क्रम में सबसे ऊपर यानी पहले स्थान पर आता था। इतना ही नहीं, उस समय के ब्रिटिश भारत के वायसराय लॉर्ड कर्जन ने यहां तक सुझाव दिया था कि ओमान को भी भारतीय साम्राज्य की एक साधारण देसी रियासत की तरह ही दर्जा दिया जाना चाहिए, जैसे कि बलूचिस्तान के इलाकों को माना जाता था। उस दौर में आधुनिक यमन के अदन तक वैध भारतीय पासपोर्ट जारी किए जाते थे, क्योंकि अदन भारत का सबसे पश्चिमी बंदरगाह माना जाता था और वह बॉम्बे (मुंबई) प्रांत के प्रशासनिक दायरे में आता था। साल 1931 में जब महात्मा गांधी ने इस शहर की यात्रा की थी, तब उन्होंने यह भी गौर किया था कि वहां के कई युवा अरब खुद को भारतीय राष्ट्रवादी मानते थे।
साल 1947 में भारत से हमेशा के लिए अलग हो गए थे खाड़ी देश
शाही बंटवारों के सिलसिले में साल 1937 में सबसे पहले अदन को आधिकारिक तौर पर भारत से अलग कर दिया गया था। हालांकि, इसके बावजूद खाड़ी का बाकी पूरा इलाका एक और दशक तक भारत सरकार के अधिकार क्षेत्र के अधीन ही बना रहा। इस तरह दुबई से लेकर कुवैत तक के तमाम खाड़ी देश आखिरकार 1 अप्रैल 1947 को भारत से कानूनी रूप से अलग हुए। गौर करने वाली बात यह है कि यह ऐतिहासिक घटना ब्रिटिश राज द्वारा भारत और पाकिस्तान के विभाजन और पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा से ठीक कुछ महीने पहले घटी थी। आजादी के बाद जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने भारत के साथ-साथ अरब क्षेत्रों से भी ब्रिटिश सेना को पूरी तरह हटाने का प्रस्ताव रखा, तो इसका भारी विरोध हुआ, जिसके बाद ब्रिटेन ने अगले 24 वर्षों तक इस क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाए रखी।
जब भारतीय रुपया हुआ करता था खाड़ी देशों की आधिकारिक मुद्रा
विशेषज्ञों के मुताबिक, ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य का यह आखिरी बचा हुआ गढ़ था, जैसे पुर्तगाली भारत की आखिरी निशानी गोवा या फ्रांसीसी भारत का हिस्सा पुडुचेरी था। उस दौर में इन खाड़ी देशों की आधिकारिक मुद्रा भारतीय रुपया ही हुआ करती थी।
भारत से वहां आने-जाने का सबसे सुगम साधन 'ब्रिटिश इंडिया लाइन' नाम की शिपिंग कंपनी थी और अरब की करीब 30 रियासतों का प्रशासनिक कामकाज वे 'ब्रिटिश रेजिडेंट्स' संभालते थे जिनका पूरा करियर 'इंडियन पॉलिटिकल सर्विस' में बीता था। अंततः ब्रिटेन ने 'स्वेज नहर के पूर्व में अपनी औपनिवेशिक जिम्मेदारियों को त्यागने' की नीति के तहत साल 1971 में गल्फ एरिया से अपनी पूरी तरह वापसी की, जिससे यह अनूठा इतिहास हमेशा के लिए अतीत के पन्नों में दर्ज हो गया।