Basant Panchami : जानिए क्यों मनाई जाती है बसंत पंचमी, क्या है महत्व और मान्यता

बसंत जीवन के उत्साह का प्रतीक है। इस दिन से प्रकृति एक नई करवट लेती है और जीवन सुखदायी हो जाता है। हम शीत ऋतु की विदाई और बसंत के आगमन पर प्रकृति का हर चर-अचर प्राणी आनन्दोत्सव मनाते हैं।

बसंत जीवन के उत्साह का प्रतीक है। इस दिन से प्रकृति एक नई करवट लेती है और जीवन सुखदायी हो जाता है। हम शीत ऋतु की विदाई और बसंत के आगमन पर प्रकृति का हर चर-अचर प्राणी आनन्दोत्सव मनाते हैं। लोग शीत की जड़ता को त्याग कर बसंत की सक्रियता और सजीवता को पुनः प्राप्त करते हैं। जीवन में किसी भी प्रकार की नई शुरुआत के लिए वसंत पंचमी श्रेष्ठ मुहूर्त है। इसी दिन ब्रह्माजी के मुख से ज्ञान की देवी मां सरस्वती का प्राकट्य हुआ था।

Basant Panchami

जहां प्रेम है, वहां प्रार्थना

बसन्त का मूल तात्पर्य प्रेम मार्ग से परमेश्वर की ओर अग्रसर होना है। जहां प्रेम है, वहां प्रार्थना है। और जहां प्रार्थना है, वहां परमात्मा है। किसी की आंख में प्रीति से झांको, किसी का हाथ प्रेम से हाथ में ले लो, उसी ( परमात्मा ) का नाम उभर आएगा। यही तो परमानंद है। आज भी बसंतोत्सव प्रेम पर्व के रूप में मनाया जाता है। इसमें कुछ विकृतियां जरूर आ गई हैं।

बसंत कर्मण्यता का अभिप्रकाश है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि ऋतुओं में वसंत हूं। अर्थात जहां जीवन उत्सव मनता हो, जहां जीवन खिलता हो बसंत जैसा, जहां सब बीज अंकुरित होकर फूल बन जाते हों, वसंत में मैं हूं। ईश्वर सिर्फ उन्हीं को उपलब्ध होता है, जो जीवन के उत्सव में, जीवन के रस में, जीवन के छंद में, उसके संगीत में, उसे देखने की क्षमता जुटा पाते हैं। उदास, रोते हुए, भागे हुए लोग, उसे नहीं देख पाते। पृथ्वी पर सनातन धर्म ही है, जिसने उत्सव में प्रभु को देखने की चेष्टा की है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन ब्रह्माण्ड के रचयिता ब्रह्माजी ने सरस्वती की रचना की थी और ब्रह्मांड की रचना का कार्य शुरू किया था। पुराणों के अनुसार, विष्णु जी की आज्ञा से ब्रह्माजी ने मनुष्य योनि की रचना की। अपनी आरंभिक अवस्था में मनुष्य मूक था, इसलिए तब धरती एकदम शांत थी। इससे धरती पर नीरसता बढ़ रही थी। तब ब्रह्माजी ने यह देखा तो उन्होंने अपने कमंडल से जल छिड़का।

मां सरस्वती को विद्या की देवी भी माना जाता

इससे एक अद्भुत शक्ति के रूप में एक सुंदर स्त्री प्रकट हुईं जो चतुर्भुजी थीं। एक हाथ में वीणा तो दूसरे में वर मुद्रा थी। इनकी वीणा की आवाज से तीनों लोकों में कंपन हुआ। इन्हें सरस्वती कहा गया। इसी कंपन से सभी को शब्द और वाणी मिली। इसीलिए सनातन धर्म में मां सरस्वती को विद्या की देवी भी माना जाता है।

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