मंत्री दीपक प्रकाश की कुर्सी पर संकट: सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा- बिना विधायक या MLC बने 6 महीने से ज्यादा मंत्री कैसे?

मंत्री दीपक प्रकाश की कुर्सी पर संकट: सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा- बिना विधायक या MLC बने 6 महीने से ज्यादा मंत्री कैसे?

झारखंड की राजनीति से इस वक्त की एक बेहद बड़ी और सनसनीखेज कानूनी खबर सामने आ रही है। झारखंड सरकार में मंत्री दीपक प्रकाश की मंत्री पद की कुर्सी पर गंभीर संवैधानिक संकट मंडरा गया है। देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए झारखंड सरकार और खुद मंत्री दीपक प्रकाश को नोटिस जारी कर बेहद तीखा सवाल पूछा है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाब तलब किया है कि “कोई भी व्यक्ति बिना विधानसभा सदस्य (MLA) या विधान परिषद सदस्य (MLC) चुने गए, छह महीने की अधिकतम सीमा बीत जाने के बाद भी मंत्री पद पर कैसे बना रह सकता है?”

शीर्ष अदालत की इस तल्ख टिप्पणी और नोटिस के बाद झारखंड के सियासी गलियारों में हड़कंप मच गया है और विपक्ष ने तुरंत उनके इस्तीफे की मांग तेज कर दी है।

क्या है पूरा मामला और क्यों फंसा पेंच?

दरअसल, दीपक प्रकाश को करीब 6 महीने पहले झारखंड कैबिनेट में गैर-विधायक (Non-MLA) कोटे से मंत्री बनाया गया था। भारतीय संविधान के नियमों के अनुसार किसी भी गैर-विधायक व्यक्ति को मंत्री पद की शपथ दिलाई जा सकती है, लेकिन उसके लिए एक निश्चित समय सीमा तय की गई है।

  • 6 महीने की समय सीमा समाप्त: दीपक प्रकाश के मंत्री पद की शपथ लिए 6 महीने से अधिक का समय बीत चुका है। नियमानुसार इस अवधि के भीतर उन्हें राज्य विधानसभा के किसी सदन का सदस्य (विधायक) निर्वाचित हो जाना चाहिए था।

  • नहीं बन पाए सदस्य: झारखंड में फिलहाल विधान परिषद (MLC) की व्यवस्था नहीं है, केवल विधानसभा है। इस 6 महीने के दौरान राज्य में कोई उपचुनाव या ऐसा जरिया नहीं बना जिससे दीपक प्रकाश विधानसभा के सदस्य चुने जा सकें। इस संवैधानिक समय सीमा के उल्लंघन को लेकर ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी।

अनुच्छेद 164(4) का हवाला: क्या कहता है संविधान का नियम?

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकीलों ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) [Article 164(4)] का पुरजोर हवाला दिया।

संवैधानिक प्रावधान: संविधान का अनुच्छेद 164(4) स्पष्ट रूप से कहता है कि "कोई मंत्री, जो निरंतर छह मास की किसी अवधि तक राज्य के विधान-मंडल का सदस्य नहीं है, उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा।"

उच्चतम न्यायालय ने इसी संवैधानिक प्रावधान को आधार बनाते हुए कहा कि इस नियम की अनदेखी करके लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह आगामी सुनवाई में यह स्पष्ट करे कि किस कानूनी प्रावधान के तहत दीपक प्रकाश अभी भी मंत्री पद का लाभ उठा रहे हैं।

विपक्ष हमलावर, इस्तीफे की मांग तेज

सुप्रीम कोर्ट से नोटिस जारी होते ही झारखंड की विपक्षी पार्टियों ने सरकार और मुख्यमंत्री पर चौतरफा हमला बोल दिया है। विपक्ष का कहना है कि यह सरकार पूरी तरह से असंवैधानिक तरीके से चल रही है।

  • विपक्ष ने मांग की है कि नैतिकता के आधार पर दीपक प्रकाश को तुरंत अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए

  • यदि वे इस्तीफा नहीं देते हैं, तो राज्यपाल को इस मामले में हस्तक्षेप कर उन्हें पदमुक्त करना चाहिए।

अब देखना यह होगा कि इस नोटिस पर झारखंड सरकार और दीपक प्रकाश की ओर से सुप्रीम कोर्ट में क्या कानूनी दलीलें पेश की जाती हैं, लेकिन फिलहाल के लिए दीपक प्रकाश की मंत्री की कुर्सी पूरी तरह से डगमगा गई है।

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