बिहार एमएलसी चुनाव में दरभंगा ग्रेजुएट सीट पर महागठबंधन में फंसा पेंच

बिहार एमएलसी चुनाव में दरभंगा ग्रेजुएट सीट पर महागठबंधन में फंसा पेंच

बिहार की राजनीति के गलियारों में विधान परिषद (MLC) की जिन सीटों के लिए चुनाव का सरगर्मी तेज है, उनमें दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र (Darbhanga Graduate Constituency) का मुकाबला सबसे ज्यादा रोमांचक और कशमकश से भरा होता जा रहा है। राज्य के इस हाई-प्रोफाइल ग्रेजुएट चुनाव में सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक केितनों समीकरण अंदर ही अंदर पूरी तरह से उलझ चुके हैं। एक तरफ जहां मुख्य विपक्षी गठबंधन यानी 'महागठबंधन' के भीतर ही टिकट बंटवारे और सीटों के तालमेल को लेकर आपसी खींचतान खुलकर सामने आ गई है, वहीं दूसरी तरफ सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के खेमे में भी एक बागी उम्मीदवार की मौजूदगी ने मुकाबले को त्रिकोणीय और बेहद दिलचस्प बना दिया है। स्थिति यह हो गई है कि पारंपरिक विरोधियों के साथ-साथ अपने ही घर के भीतर के बागी नेताओं से निपटना दोनों ही गठबंधनों के लिए सिरदर्द साबित हो रहा है। स्नातक मतदाताओं की यह सीट हमेशा से राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मानी जाती है, क्योंकि यहां का वोटर आम मतदाताओं से अलग सोच रखता है और पढ़े-लिखे युवाओं के हाथ में जीत की असली चाबी होती है। आइए गहराई से जानते हैं कि दरभंगा ग्रेजुएट सीट के इस चुनावी रण में पर्दे के पीछे और सामने क्या कुछ पक रहा है।

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बिहार विधान परिषद की इन द्विवार्षिक चुनावों में विपक्षी एकता की जो कसौटी तय की गई थी, वह दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र आते-आते पूरी तरह बिखरती हुई नजर आ रही है। नियम और सुगबुगाहट यह थी कि विपक्षी दल मिलकर एनडीए के खिलाफ एक साझा और मजबूत उम्मीदवार उतारेंगे, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट देखने को मिल रही है। इस सीट पर महागठबंधन के भीतर आपसी समन्वय की कमी का फायदा उठाने के बजाय, कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और वाम दलों (CPI/CPI-ML) के बीच अंदरखाने टिकट और प्रभाव को लेकर जबरदस्त रार छिड़ गई है। स्थिति यह है कि एक ही कोटे के साझीदार दल एक-दूसरे के वोटों में सेंधमारी करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं, जिससे कार्यकर्ताओं के बीच भी असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मतों का यह विभाजन चुनाव के दिन तक ऐसे ही जारी रहा, तो इसका सीधा नुकसान विपक्षी गठबंधन को उठाना पड़ सकता है, क्योंकि स्नातक चुनावों में एक-एक वोट का हिसाब बहुत मायने रखता है।

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दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के दायरे में आने वाले जिलों और विशेषकर प्रतिष्ठित ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (LNMU) तथा आसपास के शिक्षण संस्थानों के परिसरों में राजनीतिक हलचल अपने चरम पर है। विश्वविद्यालय क्षेत्र से जुड़े पुराने छात्र नेता, शिक्षक और प्रोफेसर इस चुनाव में मुख्य केंद्र बिंदु बने हुए हैं। विभिन्न दलों और बागी उम्मीदवारों द्वारा ग्रेजुएट्स के बीच जाकर उनकी समस्याओं, बेरोजगारी, पुरानी पेंशन योजना और डिग्रियों के समय पर वितरण जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठाया जा रहा है। पारंपरिक रैलियों और सभाओं के बजाय इस चुनाव में व्यक्तिगत जनसंपर्क (Door-to-Door Campaigning) और सोशल मीडिया के जरिए पढ़े-लिखे मतदाताओं की नब्ज टटोली जा रही है। हर एक उम्मीदवार यह साबित करने में लगा है कि वह सदन के भीतर स्नातक युवाओं की आवाज को सबसे प्रभावी तरीके से उठा सकता है, जिससे मतदाताओं का यह वर्ग इस बार काफी असमंजस में है कि वह किस पर भरोसा करे।

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एक तरफ जहां विपक्षी महागठबंधन आपसी अंतर्कलह और बिखराव से जूझ रहा है, वहीं सत्तारूढ़ एनडीए और विशेषकर भारतीय जनता पार्टी भी पूरी तरह से सुरक्षित नजर नहीं आ रही है। इस सीट से भाजपा ने अपने पुराने और अनुभवी चेहरे सर्वेश कुमार को एक बार फिर मैदान में उतारा है, जो अपनी मजबूत राजनीतिक पकड़ के लिए जाने जाते हैं। लेकिन पार्टी के भीतर इस बार सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। पार्टी के एक प्रभावशाली और मजबूत बागी नेता ने बगावत का बिगुल फूंका है और निर्दलीय के रूप में अपनी मजबूत उम्मीदवारी ठोक दी है। इस बागी उम्मीदवार के मैदान में उतरने से भाजपा के पारंपरिक और कैडर वोट बैंक में भारी सेंधमारी होने की पूरी संभावना बन गई है। दिल्ली और स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ रखने वाले इस बागी चेहरे ने स्नातक मतदाताओं के बीच अपनी पैठ पहले से ही बना रखी है, जिससे भाजपा के रणनीतिकारों की मुश्किलें अचानक काफी बढ़ गई हैं। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि मतदान की तारीख नजदीक आते-आते यह आंतरिक विद्रोह और दलों की यह आपसी खींचतान चुनावी परिणाम को किस दिशा में मोड़ती है।