इस कॉलेज में पढ़ाई की जगह चल रही है चाय फैक्ट्री! कागजों में दौड़ रहा डिग्री कॉलेज, बर्बाद हो रहा छात्रों का भविष्य
बिहार के किशनगंज जिले के पोठिया प्रखंड अंतर्गत गोरूखल पंचायत में स्थित महात्मा गांधी मेमोरियल डिग्री कॉलेज की बदहाली और कारगुजारियों को लेकर बेहद गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय ग्रामीणों और छात्रों का आरोप है कि यह शिक्षण संस्थान केवल सरकारी दस्तावेजों और कागजों पर ही संचालित हो रहा है, जबकि इसकी जमीनी हकीकत इन दावों से कोसों दूर है।
हैरान कर देने वाली बात यह है कि जिस परिसर में युवाओं का भविष्य बनना चाहिए था, वहां वर्तमान में एक चाय फैक्ट्री संचालित हो रही है और कॉलेज के मुख्य भवन में मजदूरों के परिवार रह रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कॉलेज में न तो कभी नियमित रूप से शिक्षक आते हैं और न ही वहां किसी तरह की कक्षाएं चलती हैं।
सालभर पूरे परिसर में वीरानी और सन्नाटा पसरा रहता है, और केवल नामांकन या परीक्षा फॉर्म भरने के नाम पर कुछ छात्र यहां पहुंचते हैं जिसके बाद ताला लटक जाता है। इस व्यवस्था के चलते पोठिया प्रखंड के हजारों छात्र-छात्राओं की उच्च शिक्षा का भविष्य अधर में लटक गया है।
विधानसभा में उठा था मुद्दा, लेकिन सरकार के जवाब ने बढ़ाई मुश्किलें
इस गंभीर समस्या को लेकर किशनगंज के विधायक कमरुल हुदा ने बिहार विधानसभा के पटल पर भी पुरजोर तरीके से आवाज उठाई थी। उन्होंने सदन के माध्यम से पोठिया प्रखंड क्षेत्र में एक नए और सुसज्जित सरकारी डिग्री कॉलेज की स्थापना की पुरजोर मांग की थी। हालांकि, राज्य सरकार ने यह कहकर उनकी इस मांग को अस्वीकार कर दिया कि प्रखंड क्षेत्र में महात्मा गांधी मेमोरियल डिग्री कॉलेज पहले से ही कागजों पर सुचारू रूप से संचालित हो रहा है।
कागजी दावों के फेर में फंसा छात्रों का भविष्य, उच्च शिक्षा से हो रहे वंचित
क्षेत्रीय लोगों का दर्द है कि सरकारी रिकॉर्ड और दस्तावेजों में इस कॉलेज के चालू होने का फर्जी उल्लेख होने की वजह से इलाके में किसी नए सरकारी कॉलेज की स्वीकृति नहीं मिल पा रही है, जबकि हकीकत यह है कि इस बहुमूल्य परिसर का उपयोग व्यावसायिक और अन्य निजी कार्यों के लिए किया जा रहा है।
इस प्रशासनिक उदासीनता का सबसे बड़ा खामियाजा आर्थिक रूप से कमजोर और ग्रामीण परिवेश के उन विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है, जो उच्च शिक्षा के लिए दूर-दराज के अन्य जिलों या कॉलेजों का रुख करने को मजबूर हैं। कई गरीब छात्र तो संसाधन और आर्थिक तंगी के चलते बीच में ही अपनी पढ़ाई हमेशा के लिए छोड़ने को विवश हो रहे हैं।