बिहार विधानसभा में सिमटती कायस्थ नुमाइंदगी: बांकीपुर में BJP हारी तो 0.6% आबादी वाले समुदाय का बचेगा केवल एक चेहरा

बिहार विधानसभा में सिमटती कायस्थ नुमाइंदगी: बांकीपुर में BJP हारी तो 0.6% आबादी वाले समुदाय का बचेगा केवल एक चेहरा

बिहार की राजनीति में कभी 'ब्रेन ट्रस्ट' और सत्ता के केंद्र बिंदु माने जाने वाले कायस्थ समुदाय की राजनीतिक नुमाइंदगी राज्य विधानसभा में ऐतिहासिक रूप से न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है। जातिगत गणना (Caste Census) की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में महज 0.60% आबादी वाले इस सवर्ण समुदाय का प्रतिनिधित्व लगातार सिकुड़ता जा रहा है। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य और टिकटों के गणित को देखें तो अगर आगामी चुनावों में पटना की हॉट सीट मानी जाने वाली बांकीपुर विधानसभा सीट (Bankipur Assembly Seat) से भारतीय जनता पार्टी (BJP) को शिकस्त मिलती है, तो 243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में कायस्थ बिरादरी का केवल एक ही चेहरा शेष रह जाएगा। यह स्थिति उस समुदाय के लिए अत्यंत चिंताजनक है, जिसने बिहार को देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और लोकनायक जयप्रकाश नारायण जैसे महान नेता दिए हैं।

बांकीपुर और पटना साहिब: कायस्थ राजनीति के दो आखिरी मजबूत गढ़ बिहार में राजधानी पटना और उसके आस-पास के शहरी इलाके हमेशा से कायस्थ राजनीति के मुख्य केंद्र रहे हैं। वर्तमान में बिहार विधानसभा में इस समुदाय के गिने-चुने चेहरे ही मौजूद हैं, जिनमें मुख्य रूप से पटना साहिब से भाजपा विधायक नंद किशोर यादव (जो वर्तमान में विधानसभा अध्यक्ष हैं) और बांकीपुर से नितिन नवीन शामिल हैं। हालांकि, नंद किशोर यादव की राजनीतिक पृष्ठभूमि और सामाजिक समीकरण अलग हैं, लेकिन सवर्ण कायस्थ प्रतिनिधित्व के लिहाज से नितिन नवीन की सीट बेहद महत्वपूर्ण है। यदि किसी राजनीतिक उलटफेर में भाजपा बांकीपुर सीट गंवाती है, तो विधानसभा में इस बौद्धिक वर्ग की आवाज उठाने वाला लगभग कोई नहीं बचेगा, क्योंकि अन्य प्रमुख दलों (आरजेडी, जेडीयू, कांग्रेस) ने इस समुदाय को मुख्यधारा की चुनावी राजनीति से लगभग दरकिनार कर दिया है।

जातिगत गणना के आंकड़ों ने बिगाड़ा खेल, घटते वोट बैंक से पार्टियां हुईं बेरुखी बिहार सरकार द्वारा जारी किए गए जातिगत आधारित गणना के आंकड़ों के बाद राज्य की राजनीति पूरी तरह से 'जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी' के फार्मूले पर शिफ्ट हो गई है। आंकड़ों में कायस्थों की जनसंख्या कुल आबादी का मात्र 0.60% (लगभग 7.9 लाख) आंकी गई है। इस अत्यंत कम संख्याबल के कारण सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने सवर्णों के भीतर भी अब भूमिहार, राजपूत और ब्राह्मण समीकरणों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया है। कायस्थ समुदाय, जो परंपरागत रूप से शत-प्रतिशत भाजपा का कोर वोटर माना जाता रहा है, अब टिकट वितरण के समय अपनी ही पसंदीदा पार्टी में उपेक्षा का शिकार हो रहा है, क्योंकि पार्टियां केवल उन्हीं सीटों पर दांव लगा रही हैं जहां संख्याबल निर्णायक भूमिका में हो।

डॉ. जगन्नाथ मिश्रा से लेकर आज तक: कैसे हाशिए पर आ गया महापुरुषों का समाज? एक समय था जब बिहार की राजनीति में अनुग्रह नारायण सिन्हा, श्रीकृष्ण सिंह के दौर के बाद और लालू-नीतीश युग से पहले कायस्थ नेताओं का खासा दबदबा हुआ करता था। महामाया प्रसाद सिन्हा जैसे मुख्यमंत्री और डॉ. जगन्नाथ मिश्रा के मंत्रिमंडल में इस समुदाय के मंत्रियों की भारी धमक हुआ करती थी। पटना की अधिकांश सीटों पर कायस्थ उम्मीदवार ही जीत का सेहरा पहनते थे। लेकिन मंडल आयोग (Mandal Commission) के लागू होने के बाद और बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति के उभार के साथ ही यह समुदाय धीरे-धीरे चुनावी बिसात से गायब होने लगा। युवाओं का बड़े पैमाने पर बिहार से पलायन और नौकरियों व शिक्षा के लिए दिल्ली-मुंबई का रुख करना भी राज्य की राजनीति में इनकी जमीनी पकड़ कमजोर होने की एक बड़ी वजह बना।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व की इस चिंताजनक स्थिति पर उठते 3 बड़े सवाल:

  • क्या केवल संख्याबल ही तय करेगा राजनीतिक हिस्सेदारी? लोकतंत्र में अल्पसंख्यक और बौद्धिक समुदायों के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखने के लिए राजनीतिक दलों के पास क्या कोई वैकल्पिक नीति है, या 0.6% आबादी होने के कारण उन्हें पूरी तरह अदृश्य कर दिया जाएगा?

  • कोर वोटर होने के बाद भी भाजपा में क्यों घट रहे टिकट? कायस्थ समाज दशकों से भाजपा का वैचारिक और चुनावी सिपाही रहा है। इसके बावजूद पार्टी टिकटों के बंटवारे में इस वर्ग को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने से क्यों कतरा रही है?

  • विपक्ष (RJD-Congress) के 'A टू Z' के नारे में कहां हैं कायस्थ? राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस जब सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की बात करते हैं, तो चुनावी सूचियों में कायस्थ समाज के उम्मीदवारों का नाम न के बराबर क्यों होता है?

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