सेटेलाइट सिटी के जमीन अधिग्रहण पर गरमाई सियासत, किसान नेता राकेश टिकैत का बड़ा बयान
देश भर के किसानों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले और भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत एक बार फिर अपनी बेबाक बयानी और आक्रामक तेवरों के चलते सुर्खियों में छाए हुए हैं। उत्तर प्रदेश और देश के अन्य तेजी से विकसित हो रहे शहरी क्षेत्रों में आधुनिकता की दौड़ के तहत बसाई जाने वाली 'सेटेलाइट सिटी' (Satellite City) परियोजनाओं के लिए किसानों की उपजाऊ जमीनों के अधिग्रहण का मुद्दा इन दिनों तूल पकड़ता जा रहा है। सरकारें जहां एक तरफ इन आधुनिक परियोजनाओं के जरिए शहरीकरण को बढ़ावा देने और विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा तैयार करने का दावा कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ अपनी जमीनों से बेदखल होने वाले किसान और उनके नुमाइंदे इस विकास मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। इसी कड़ी में किसान नेता राकेश टिकैत ने हाल ही में एक बड़ी किसान महापंचायत के दौरान सरकार को दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि किसानों को उनकी जमीन का बाजार भाव से कई गुना बेहतर और न्यायसंगत मुआवजा दिए बिना एक इंच भी जमीन पर कब्जा नहीं करने दिया जाएगा।
'जो 13 साल पहले सोने का भाव था, आप हमें वह रेट दो', जानिए टिकैत के इस अजीब और कड़े तर्क के मायने
अपने अनूठे और जनवादी अंदाज में सरकार पर निशाना साधते हुए राकेश टिकैत ने एक ऐसा बयान दिया है जिसने प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। उन्होंने सरकार और जिला प्रशासन को ललकारते हुए कहा कि यदि सरकार को किसानों की पीढ़ियों पुरानी उपजाऊ जमीन चाहिए, तो उन्हें मुआवजे का पैमाना बिल्कुल नए और ऐतिहासिक आधार पर तय करना होगा। टिकैत ने व्यंग्य करते हुए कहा कि, 'जो 13 साल पहले सोने का भाव था, सरकार हमें हमारी जमीन के बदले उस हिसाब से सोने के भाव के बराबर मुआवजा दे, तभी हम अपनी जमीन छोड़ने पर विचार करेंगे।' उनके इस बयान के पीछे का मुख्य तर्क यह था कि आज से तेरह साल पहले सोने की कीमत बहुत कम हुआ करती थी और आज वह आसमान छू रही है, बिल्कुल उसी तरह जमीनों के सरकारी मुआवजे के पुराने रेट्स और आज की महंगाई तथा बाजार कीमत में जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है। किसानों का यह तर्क है कि सरकारें औने-पौने दामों पर किसानों की जमीनें अधिग्रहित कर लेती हैं और बाद में उन्हें बड़े-बड़े बिल्डर्स और कॉर्पोरेट घरानों को महंगे दामों पर बेचकर मालामाल हो जाती हैं, जिसे अब किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
क्यों विरोध कर रहे हैं किसान? सेटेलाइट सिटी परियोजनाओं को लेकर क्या हैं जमीनी विवाद?
देश के विभिन्न हिस्सों में महानगरों के विस्तार के लिए बनाई जा रही 'सेटेलाइट सिटी' परियोजनाओं के तहत हजारों एकड़ कृषि भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है, जिससे उन इलाकों के स्थानीय किसानों का जीवन संकट में पड़ गया है। किसानों का यह दर्द है कि जिस जमीन पर उनके पूर्वज खेती करके अपने परिवार का पेट पालते आए हैं और जिससे उनकी भावनाएं जुड़ी हुई हैं, उसे मामूली मुआवजे के बल पर छीन लिया जाता है। इसके अलावा विस्थापन के बाद मिलने वाले मुआवजे की राशि इतनी कम होती है कि उससे किसान शहर के पास दूसरी जगह जमीन नहीं खरीद पाते और वे रातों-रात भूमिहीन मजदूर बनने की कगार पर पहुंच जाते हैं। राकेश टिकैत ने इसी व्यवस्था पर करारा प्रहार करते हुए कहा कि किसानों को सिर्फ कागजी मुआवजे का झुनझुना थमाया जा रहा है, जबकि उनके बच्चों का भविष्य और आजीविका पूरी तरह से अंधकार में धकेली जा रही है। यही वजह है कि सेटेलाइट सिटी के इस पूरे प्रोजेक्ट के खिलाफ किसानों का गुस्सा फूट पड़ा है और वे सड़कों पर उतरकर आर-पार की लड़ाई का मन बना चुके हैं।
सरकार और किसानों के बीच बढ़ता टकराव, आने वाले दिनों में क्या होगा अगला कदम?
राकेश टिकैत की इस दो टूक चेतावनी और 'सोने के भाव' वाले मुआवजे की मांग के बाद अब स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार के अधिकारियों की नींद उड़ गई है, क्योंकि वे जानते हैं कि टिकैत के नेतृत्व में होने वाला कोई भी आंदोलन आसानी से थमता नहीं है। किसान यूनियन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सरकार किसानों के साथ बैठकर उनकी शर्तो और बाजार की वास्तविक कीमतों के आधार पर मुआवजा पैकेज तय नहीं करती, तब तक किसी भी सर्वे या निर्माण कार्य को आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा। इस हाई-वोल्टेज ड्रामे के बीच यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या सरकार किसानों के इस कड़े रुख के आगे झुककर मुआवजे की दरों में संशोधन करती है या फिर प्रशासन और किसानों के बीच एक बार फिर से लंबी और संघर्षपूर्ण कानूनी तथा सड़क की लड़ाई देखने को मिलती है। देश के अन्नदाता का यह तेवर इस बात का सबूत है कि वे अब अपने हक और वजूद की लड़ाई लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं और किसी भी कीमत पर अपने अधिकारों से पीछे हटने वाले नहीं हैं।