प्रशांत किशोर के इस दांव ने बिहार के सभी सियासी समीकरण कर दिए फेल, आगे भी बढ़ा सकते हैं बीजेपी की टेंशन
बिहार की राजनीति में बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव का परिणाम कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं रहा बल्कि जनता के बदलते मूड और नए राजनीतिक विकल्पों की तलाश का संकेत भी बन गया है। प्रशांत किशोर ने कम समय में ऐसा प्रदर्शन किया जिसकी कल्पना कई राजनीतिक विश्लेषकों ने नहीं की थी।
बांकीपुर सीट लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ रही है। यहां नितिन नवीन और उनके पिता स्वर्गीय नवीन किशोर सिन्हा का करीब तीन दशक तक प्रभाव रहा। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद यह सीट खाली हुई थी। ऐसे में इस सीट पर जनसुराज का उभरना बिहार की राजनीति में एक बड़ा संदेश माना जा रहा है।
हार के बाद भी जारी रही जनसुराज की तैयारी
प्रशांत किशोर की सफलता अचानक नहीं आई। इसके पीछे लंबे समय से चल रही राजनीतिक तैयारी और जनता के बीच लगातार संपर्क को वजह माना जा रहा है।
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जनसुराज को बड़ी हार का सामना करना पड़ा था। पार्टी के 236 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। केवल दो प्रत्याशी अपनी जमानत बचा पाए थे। इसके बावजूद जनसुराज को करीब 3.4 प्रतिशत वोट मिले थे।
राजनीतिक जानकारों के लिए यह आंकड़ा भी महत्वपूर्ण था क्योंकि एक नई पार्टी के लिए शुरुआती दौर में इतना समर्थन मिलना आसान नहीं होता। जनसुराज ने शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था, रोजगार और बिहार से पलायन जैसे मुद्दों को केंद्र में रखा था। यही मुद्दे आगे भी उसके अभियान का आधार बने रहे।
बांकीपुर की जनता ने दिया बड़ा समर्थन
बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में कुल करीब 3 लाख 79 हजार मतदाता थे। हालांकि उपचुनाव में मतदान प्रतिशत काफी कम रहा और केवल 1 लाख 30 हजार 246 लोगों ने वोट डाला।
इनमें सबसे ज्यादा समर्थन प्रशांत किशोर को मिला। उन्हें 64 हजार 151 वोट हासिल हुए। भाजपा उम्मीदवार नीरज सिन्हा को 44 हजार 827 वोट मिले जबकि राजद की रेखा गुप्ता 14 हजार 273 वोटों पर रहीं।
अन्य 22 उम्मीदवारों में प्रगतिशील जनता पार्टी के मनोरंजन श्रीवास्तव को सबसे ज्यादा 973 वोट मिले। निर्दलीय ब्रजेश पटेल को केवल 70 वोट मिले। वहीं 646 मतदाताओं ने नोटा का विकल्प चुना।
जनता के बीच सक्रियता बनी प्रशांत की ताकत
बांकीपुर में जीत के पीछे प्रशांत किशोर की लगातार जनता से जुड़ने की रणनीति को अहम माना जा रहा है।
2025 के विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद उन्होंने राजनीतिक यात्रा रोकने के बजाय बिहार के गांवों और लोगों के बीच जाने का फैसला किया। वह पश्चिम चंपारण के भितिहरवा आश्रम पहुंचे जहां महात्मा गांधी ने नील किसानों के आंदोलन की शुरुआत की थी। वहां उन्होंने 24 घंटे का मौन व्रत रखा।
इसके बाद उन्होंने कहा कि जनसुराज का उद्देश्य किसी दल को हराना नहीं बल्कि बिहार के विकास के लिए काम करना है। उन्होंने बिहार के लिए अगले 10 साल समर्पित करने की बात कही।
प्रशांत किशोर ने दिल्ली का अपना घर छोड़ दिया और अपनी 20 वर्षों की कमाई का 90 प्रतिशत हिस्सा जनसुराज को देने का ऐलान किया। उन्होंने आम लोगों से भी पार्टी के लिए आर्थिक सहयोग करने की अपील की।
मुद्दों पर सड़क से सदन तक दिखी सक्रियता
पिछले कुछ समय में प्रशांत किशोर कई जन मुद्दों को लेकर सक्रिय नजर आए।
पटना में जहानाबाद की नीट छात्रा से जुड़े अपराध का मामला हो या बंटी यादव हत्याकांड अथवा आरा के बेलौटी गांव में भारत भूषण तिवारी की हिरासत में मौत का मामला। प्रशांत किशोर पीड़ित परिवारों से मिलने पहुंचे।
पटना में छात्रों पर हुए लाठीचार्ज के विरोध में भी उन्होंने सरकार के खिलाफ आवाज उठाई। उनकी यह सक्रियता युवाओं और नए मतदाताओं के बीच चर्चा का विषय बनी।
युवा कार्यकर्ताओं ने संभाली चुनावी जिम्मेदारी
2025 के चुनाव में जनसुराज के पास बड़ी संख्या में भुगतान वाले कार्यकर्ता थे। लेकिन बांकीपुर उपचुनाव में पार्टी ने स्थानीय और समर्पित युवाओं को आगे किया।
इन कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर लोगों से संपर्क किया। प्रशांत किशोर खुद देर रात तक मोहल्लों में बैठकर लोगों की समस्याएं सुनते रहे।
चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सीमित सक्रियता और भाजपा द्वारा उन्हें पर्याप्त महत्व नहीं दिए जाने जैसे मुद्दे उठाए। इन बातों का असर मतदाताओं पर दिखाई दिया।
राजद और भाजपा के लिए बढ़ी चुनौती
बांकीपुर के परिणाम ने राजद के भीतर भी चिंता बढ़ा दी है। बिहार विधानसभा चुनाव में राजद केवल 25 सीटों तक सीमित रह गई थी।
राजद सांसद मीसा भारती ने प्रशांत किशोर को भाजपा का समर्थन प्राप्त उम्मीदवार बताया। वहीं रोहिणी आचार्य ने उन्हें जमीन से जुड़ा नेता बताते हुए तेजस्वी यादव पर सवाल उठाए।
वहीं तेजस्वी यादव जिन्होंने चुनाव से पहले जीत का दावा किया था अब प्रशांत किशोर के बढ़ते प्रभाव को लेकर राजनीतिक दबाव में दिखाई दे रहे हैं।
क्या बिहार में नया राजनीतिक केंद्र बन सकते हैं प्रशांत किशोर?
बिहार की राजनीति लंबे समय तक लालू यादव के इर्द-गिर्द घूमती रही है। राज्य में लालू समर्थक और विरोधी राजनीति का प्रभाव रहा है।
समय के साथ लालू यादव की सक्रियता कम हुई और पार्टी की जिम्मेदारी तेजस्वी यादव के हाथों में आ गई। उम्मीदवार चयन से लेकर संगठन संचालन तक कई फैसले अब तेजस्वी की टीम लेती है।
राजद के घटते जनाधार के बीच प्रशांत किशोर का उभरना एक नई राजनीतिक संभावना पैदा करता है। देश में आम आदमी पार्टी का उभार और तमिलनाडु में नए राजनीतिक चेहरों की एंट्री यह दिखाती है कि जनता नए विकल्पों को मौका दे सकती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में नया केंद्र बन पाएंगे। इसका जवाब आने वाले चुनावों में मिलेगा।