अनंत सिंह के ढाल क्यों बने ललन सिंह? कभी थी खून की प्यासी अदावत

अनंत सिंह के ढाल क्यों बने ललन सिंह? कभी थी खून की प्यासी अदावत

भारतीय राजनीति और विशेष तौर पर बिहार के अखाड़े में रिश्तों के समीकरण जितनी तेजी से बदलते हैं, शायद ही देश के किसी अन्य राज्य में ऐसा देखने को मिलता हो। कभी मोकामा और बाढ़ के इलाकों में गोलियों की गूंज और वर्चस्व की लड़ाई के लिए जाने जाने वाले बाहुबली अनंत सिंह और जनता दल यूनाइटेड के कद्दावर नेता तथा केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह के बीच का रिश्ता इन दिनों राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा चर्चा का विषय बना हुआ है। एक समय ऐसा था जब इन दोनों दिग्गजों के बीच की राजनीतिक और क्षैत्रिय अदावत इस हद तक बढ़ चुकी थी कि एक-दूसरे की जान के प्यासे होने की चर्चाएं सरेआम हुआ करती थीं, लेकिन वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि आज वही ललन सिंह संकट के समय में अनंत सिंह के सबसे बड़े राजनीतिक संरक्षक और ढाल बनकर खड़े नजर आ रहे हैं। बिहार की राजनीति के जानकारों का यह मानना है कि 2005 से शुरू हुई इस कहानी में कई ऐसे उतार-चढ़ाव, खून-खराबे, जेल की सलाखों और सत्ता के समीकरणों का खेल चला है जिसने इन दोनों नेताओं की व्यक्तिगत और राजनीतिक प्राथमिकताओं को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है।

2005 का वो दौर जब मोकामा की धरती पर खून की प्यासी अदावत ने ले लिया था भयानक रूप

इस पूरी कहानी की शुरुआत साल 2005 के उस दौर से होती है जब बिहार में लालू प्रसाद यादव के लंबे शासनकाल का अंत हो रहा था और नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सत्ता की बागडोर संभालने की तैयारी कर रहा था। उस दौरान मोकामा और आसपास के इलाकों में अनंत सिंह का वर्चस्व अपनी चरम सीमा पर था और ललन सिंह भूमिहार जाति के सबसे बड़े राजनीतिक चेहरे के रूप में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेहद करीबी और विश्वासपात्र माने जाते थे। क्षेत्रीय वर्चस्व, टेंडर मैनेजिंग, बालू घाटों के ठेके और राजनीतिक प्रभुत्व को लेकर दोनों के रास्ते इस तरह से टकराए कि धीरे-धीरे यह अदावत व्यक्तिगत दुश्मनी में बदल गई। उस दौर के अखबारों और पुलिस फाइलों में इन दोनों पक्षों के बीच हुई तनातनी और हिंसक वारंगतों के कई किस्से दर्ज हैं, जहां हर कोई यह मान बैठा था कि अनंत सिंह और ललन सिंह कभी एक मंच पर या एक पाले में साथ खड़े नहीं हो सकते। जातिगत समीकरणों के लिहाज से एक ही समाज से आने वाले ये दोनों दिग्गज जब आमने-सामने होते थे, तो पूरे इलाके का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच जाता था और हर कोई इनकी अगली चाल पर पैनी नजर रखता था।

सत्ता के गलियारों में बदलते समीकरण: जेल से लेकर संसद तक कैसे सिमटती गई दूरियां

समय के साथ जैसे-जैसे बिहार की राजनीति ने नए करवट लिए, वैसे-वैसे यह महसूस किया जाने लगा कि क्षेत्रीय क्षत्रपों और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के बीच की यह लंबी दुश्मनी पार्टी के जनाधार और सामाजिक समीकरण को नुकसान पहुंचा रही है। नीतीश कुमार की कार्यशैली हमेशा से यह रही है कि वे अपनी पार्टी के भीतर सभी जातियों के बड़े नेताओं को साधकर एक मजबूत सामाजिक कोएलिशन तैयार करें, और इस रणनीति के तहत समय-समय पर अंदरखाने सुलह के प्रयास भी शुरू हुए। पिछले कुछ वर्षों के दौरान जब अनंत सिंह कानूनी मामलों और गंभीर आपराधिक आरोपों के चलते जेल के भीतर लंबे समय तक बंद रहे, तो उनके राजनीतिक वजूद को बचाने के लिए पार्टी के भीतर और बाहर कुछ ऐसे पर्दे के पीछे के प्रयास हुए जिसने रिश्तों की बर्फ पिघलानी शुरू कर दी। ललन सिंह, जो केंद्र की राजनीति में एक बड़ा मुकाम हासिल कर चुके थे और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल चुके थे, उन्होंने यह महसूस किया कि मोकामा क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने और विरोधी ताकतों को मात देने के लिए पुराने गिले-शिकवों को भुलाना जरूरी है। धीरे-धीरे जेल के भीतर और बाहर दोनों नेताओं के बीच संदेशों का आदान-प्रदान शुरू हुआ और यहीं से वह जमीन तैयार हुई जिसने कभी खून के प्यासे रहे इन दोनों दिग्गजों को एक ही राजनीतिक छाते के नीचे ला खड़ा किया।

2026 की मौजूदा हकीकत: अब संकट के हर दौर में एक-दूसरे का सबसे बड़ा सहारा बने दोनों नेता

आज वर्ष 2026 के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को अगर देखा जाए, तो अनंत सिंह और ललन सिंह के बीच का यह नया समीकरण बिहार की राजनीति का सबसे मजबूत और अचूक हथियार बन चुका है। हालिया कानूनी लड़ाइयों, चुनावों और क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाइयों के दौरान जिस प्रकार से ललन सिंह ने खुलकर अनंत सिंह और उनके परिवार का समर्थन किया है, उसने यह साबित कर दिया है कि राजनीति में न तो कोई स्थाई दुश्मन होता है और न ही कोई स्थाई दोस्त। भूमिहार समाज के इन दो सबसे बड़े स्तंभों के एक हो जाने से मोकामा, बाढ़, लखीसराय और आसपास के पूरे बेल्ट में विपक्षी दलों के लिए राजनीतिक जमीन तलाशना बेहद मुश्किल हो गया है। कभी एक-दूसरे की मुखालफत करने वाले ये दोनों नेता आज जब कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते हैं, तो विरोधियों के सारे समीकरण धरे के धरे रह जाते हैं। 2005 की खूनी अदावत से लेकर 2026 की इस मजबूत रफाकत तक का यह सफर इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि राजनीति में केवल और केवल परिस्थितियों की महत्ता होती है, और वक्त के साथ हर पुराना जख्म सियासी नफा-नुकसान के गणित में आकर पूरी तरह से भर जाता है।