Crude Oil: वैश्विक तनाव से $90 के इर्द-गिर्द घूम रहा कच्चा तेल, क्या अमेरिका के फैसलों से और बिगड़ेंगे वैश्विक बाजार के हालात?

Crude Oil: वैश्विक तनाव से $90 के इर्द-गिर्द घूम रहा कच्चा तेल, क्या अमेरिका के फैसलों से और बिगड़ेंगे वैश्विक बाजार के हालात?

वैश्विक ऊर्जा बाजार (Global Energy Market) इस समय भू-राजनीतिक मोर्चे पर हो रहे बड़े बदलावों और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों के चलते भारी उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रहा है। साल 2026 की शुरुआत में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच भड़के सैन्य संकट और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) की आंशिक नाकाबंदी के बाद कच्चे तेल की कीमतें रिकॉर्ड $140 प्रति बैरल के पार चली गई थीं। हालांकि, हाल के हफ्तों में आए राजनयिक मोड़ों के बाद अब अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) $90 प्रति बैरल के बेहद संवेदनशील मनोवैज्ञानिक स्तर के इर्द-गिर्द ट्रेड कर रहा है।

बाजार के जानकारों का मानना है कि अमेरिकी प्रशासन की धमकियां, प्रतिबंधों की नीतियां और संभावित समझौतों के ऐलान किसी भी वक्त कच्चे तेल की चाल को बेलगाम कर सकते हैं।

$140 से $90 के स्तर तक कैसे आया कच्चा तेल?

अप्रैल 2026 में जब ईरान संकट अपने चरम पर था, तब दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्ग (Strait of Hormuz) के बंद होने से दुनिया भर में ईंधन का संकट खड़ा हो गया था। लेकिन जून और जुलाई 2026 के दौरान कीमतों में एक बड़ा यू-टर्न देखा गया:

  • ट्रंप का शांति समझौते का दावा: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ओवल ऑफिस से दिए गए उस बयान के बाद बाजार में 37% तक की भारी गिरावट दर्ज की गई, जिसमें उन्होंने ईरान के साथ एक बड़े 'युद्ध समझौते' (Settlement) के करीब होने का दावा किया था। बाजार ने इसे प्रतिबंधों में ढील और तेल की आपूर्ति बढ़ने के संकेत के रूप में लिया।

  • सीजफायर और हमलों पर रोक: हाल ही में अमेरिकी हमलों और ईरानी जवाबी कार्रवाइयों में आए अस्थायी ठहराव (Pause in Hostilities) के कारण ट्रेडर्स ने आक्रामक लिवाली कम की, जिससे ब्रेंट क्रूड $100 के स्तर से फिसलकर $90.50 के आसपास आ गया।

अमेरिका की नीति और प्रतिबंधों की धमकी का क्या होगा असर?

कच्चे तेल की कीमतों में आई मौजूदा गिरावट को विशेषज्ञ एक 'अस्थायी शांति' मान रहे हैं। अगर अमेरिका की तरफ से दोबारा सख्त रुख अपनाया जाता है या धमकियों का दौर शुरू होता है, तो हालात निम्नलिखित कारणों से बिगड़ सकते हैं:

  • सऊदी अरब और इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले: हाल ही में ईरान समर्थित हौथी विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के तेल टैंकरों और इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने की खबरों ने बाजार को दोबारा चौकन्ना कर दिया है। यदि अमेरिका इन हरकतों के खिलाफ कोई सख्त सैन्य कदम उठाता है, तो तेल की कीमतें फिर से $100 का आंकड़ा पार कर सकती हैं।

  • स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR): अमेरिका और यूरोपीय देशों के तेल भंडार (Inventories) पहले ही निचले स्तर पर हैं। ऐसे में किसी भी नए प्रतिबंध या सप्लाई चेन में रुकावट आने पर बैकअप की कमी के कारण कीमतों में ब्रेक लगना नामुमकिन हो जाएगा।

  • सऊदी के नेतृत्व में नया गठबंधन: आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए सऊदी अरब और 13 अन्य देशों द्वारा एक नए समुद्री रक्षा गठबंधन (Maritime Defence Alliance) की घोषणा की गई है, जो यह दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर तनाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

भारत के लिए $90 का यह 'मैथ्स' क्यों है बेहद अहम?

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85% हिस्सा विदेशों से आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में $90 के पार कच्चे तेल का बने रहना भारत के लिए दोधारी तलवार जैसा है:

  1. राहत की बात: $140 के मुकाबले $90 का स्तर भारत के आयात बिल को अरबों डॉलर कम करता है, जिससे देश का चालू खाता घाटा (CAD) नियंत्रण में रहता है और भारतीय रुपया मजबूत होता है।

  2. चिंता की बात: यदि अमेरिकी नीतियों के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें $90 के स्तर को तोड़कर ऊपर भागती हैं, तो भारत में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों (Retail Fuel Prices) पर दबाव बढ़ेगा, जिससे घरेलू महंगाई दर में इजाफा हो सकता है।

फिलहाल, वैश्विक बाजार की नजरें अमेरिका के अगले राजनीतिक कदमों और ईरान के साथ होने वाले अंतिम दस्तावेजों पर टिकी हैं। जब तक भू-राजनीतिक स्थिरता पूरी तरह बहाल नहीं होती, कच्चे तेल में अनिश्चितता का यह खेल जारी रहेगा।

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