Crude Oil: अब तक शांत बैठा चीन अचानक तेल के लिए क्यों हुआ उतावला? ड्रैगन के इंपोर्ट बढ़ाने से क्यों मची है दुनिया भर में बेचैन, जानिए भारत पर इसका कितना गहरा असर होगा
ग्लोबल एनर्जी मार्केट में इन दिनों एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाला मोड़ देखने को मिल रहा है। पिछले कुछ समय से सुस्त चाल चल रहा और खामोशी से अपनी जरूरतें पूरी कर रहा ड्रैगन यानी चीन अचानक से कच्चे तेल (Crude Oil) की बंपर खरीदारी के लिए बेहद उतावला हो गया है। चीन द्वारा अचानक अपने तेल आयात (Oil Import) को तेजी से बढ़ाए जाने के बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा विशेषज्ञों और पश्चिमी देशों की नींद उड़ गई है। दुनिया भर के बाजारों में इस बात को लेकर हलचल तेज हो गई है कि आखिर चीन की इस अचानक जाग, भारी-भरकम स्टोरेज और ताबड़तोड़ खरीद के पीछे का असली भू-राजनीतिक या आर्थिक खेल क्या है। आइए समझते हैं इस पूरी चाल के हर पहलू को और देखते हैं कि चीन के इस कदम का भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर क्या असर पड़ने वाला है।
आखिर क्यों अचानक तेल खरीदने के लिए बेताब हो गया है चीन?
विश्लेषकों का मानना है कि चीन का यह अचानक उठाया गया कदम सामान्य व्यापारिक गतिविधि नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई बड़े कारण छिपे हैं:
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सस्ते तेल का फायदा उठाना: अंतरराष्ट्रीय बाजार में हालिया अनिश्चितताओं के बीच जब क्रूड ऑयल की कीमतों में थोड़े उतार-चढ़ाव देखे जा रहे हैं, तब चीन इस मौके का पूरा फायदा उठाकर अपने रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) को भरना चाहता है।
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आर्थिक रिकवरी की सुगबुगाहट: चीन के घरेलू मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और इंडस्ट्रियल गतिविधियों में अचानक तेजी के संकेत मिल रहे हैं, जिसके कारण ऊर्जा की मांग में भारी उछाल आया है।
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संभावित वैश्विक प्रतिबंधों और युद्ध की आशंका: मध्य पूर्व (Middle East) में गहराते तनाव और भविष्य में सप्लाई चेन बाधित होने के डर से ड्रैगन अभी से ही भारी मात्रा में तेल का स्टॉक जमा कर लेना चाहता है ताकि आने वाले दिनों में किसी भी वैश्विक संकट से निपटा जा सके।
चीन के इस भारी इंपोर्ट से क्यों बेचैन हो गई है पूरी दुनिया?
जब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा अर्थव्यवस्था वाला देश और सबसे बड़ा ऊर्जा आयातक अचानक अपनी खरीद की रफ्तार कई गुना बढ़ा देता है, तो ग्लोबल मार्केट पर इसका सीधा असर पड़ता है:
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कीमतों में उछाल का खतरा: चीन की तरफ से डिमांड अचानक बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतें ऊपर जाने का दबाव बन जाता है, जिससे पूरी दुनिया के लिए ईंधन महंगा होने का डर पैदा हो जाता है।
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सप्लाई चेन पर दबाव: ओपेक (OPEC) देशों और रूस से निकलने वाले तेल का एक बड़ा हिस्सा जब चीन की तरफ रुख करता है, तो अन्य विकासशील देशों के लिए सुलभ और किफायती ऊर्जा आपूर्ति का समीकरण गड़बड़ाने लगता है। पश्चिमी देशों की एजेंसियां इस बात पर भी नजर गड़ाए हुए हैं कि कहीं चीन प्रतिबंधों की परवाह किए बिना रियायती तेल का अवैध या अत्यधिक भंडारण तो नहीं कर रहा है।
भारत पर इसका क्या असर होगा? जानिए हमारे देश के लिए क्या हैं मायने
चीन के इस अचानक उतावलेपन और भारी तेल आयात का भारत पर सीधा और मिलाजुला असर देखने को मिल सकता है:
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ग्लोबल कीमतें बढ़ने से बढ़ सकता है आयात बिल: चूंकि भारत अपनी कुल ऊर्जा जरूरत का 80% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए यदि चीन की भारी मांग के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल के दाम तेजी से भागते हैं, तो भारत का कुल आयात बिल (Import Bill) बढ़ सकता है।
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सस्ते रूसी तेल की खरीद पर मुकाबला: पिछले कुछ समय से भारत रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है। ऐसे में यदि चीन भी बड़े पैमाने पर इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करता है, तो डिस्काउंटेड डील हासिल करने को लेकर दोनों एशियाई दिग्गजों के बीच कूटनीतिक और व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा और अधिक तेज हो सकती है।
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घरेलू ईंधन दरों पर निगरानी: हालांकि भारत सरकार और तेल विपणन कंपनियां (OMCs) घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखने का प्रयास करती हैं, लेकिन यदि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बहुत ज्यादा उछाल आता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था और महंगाई के मोर्चे पर चुनौतियां जरूर बढ़ सकती हैं।