रिलायंस के नए बॉन्ड इश्यू पर टूट पड़े निवेशक, लेकिन LIC ने क्यों नहीं दिखाई इसमें कोई ज्यादा दिलचस्पी

रिलायंस के नए बॉन्ड इश्यू पर टूट पड़े निवेशक, लेकिन LIC ने क्यों नहीं दिखाई इसमें कोई ज्यादा दिलचस्पी

भारतीय कॉर्पोरेट जगत और शेयर बाजार के वित्तीय गलियारों में इन दिनों देश की सबसे मूल्यवान और बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (Reliance Industries Limited) के नए बॉन्ड इश्यू (Reliance Bond Issue) की गूंज चारों तरफ सुनाई दे रही है। जब भी रिलायंस जैसी दिग्गज कंपनी बाजार में पूंजी जुटाने के लिए उतरती है, तो निवेशकों और संस्थागत खरीदारों के बीच उसे पाने के लिए हमेशा एक अलग ही होड़ मची रहती है, और इस बार भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला जब इस बॉन्ड इश्यू पर आम और खास निवेशकों का सैलाब टूट पड़ा। हालांकि, इस भारी-भरकम और सफल सब्सक्रिप्शन के बीच वित्तीय दुनिया का ध्यान खींचने वाली सबसे बड़ी और हैरान करने वाली बात यह रही कि देश की सबसे बड़ी बीमा और निवेश संस्था यानी भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) ने इस बार इस बॉन्ड में उतनी अधिक दिलचस्पी नहीं दिखाई जितनी आमतौर पर ऐसे बड़े इश्यू में उम्मीद की जाती है। आखिर रिलायंस के इस चमकदार बॉन्ड इश्यू से देश के सबसे बड़े संस्थागत निवेशक एलआईसी ने थोड़ी दूरी क्यों बनाई और इसके पीछे कौन से बड़े आर्थिक या रणनीतिक कारण छिपे हुए हैं? आइए इस दिलचस्प वित्तीय पहेली और बॉन्ड बाजार के हर एक पहलू का गहराई से विश्लेषण करते हैं।

क्या है रिलायंस का यह नया बॉन्ड इश्यू और निवेशकों के बीच क्यों मची है इसे खरीदने की लूट?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज द्वारा लाए गए इस बॉन्ड इश्यू का आकार कितना बड़ा था और इसे बाजार में निवेशकों से किस प्रकार की बंपर प्रतिक्रिया मिली है। रिलायंस अपने आगामी बिजनेस विस्तार, ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स, टेलीकॉम नेटवर्क के सुदृढ़ीकरण और कर्ज के बेहतर प्रबंधन के लिए समय-समय पर बाजार से फंड जुटाती रहती है। जब कंपनी ने इस नए बॉन्ड को निवेशकों के लिए खोला, तो निवेशकों ने इस पर पलक झपकते ही टूट पड़ना शुरू कर दिया, क्योंकि रिलायंस जैसी 'AAA' रेटिंग वाली सुरक्षित और मजबूत कंपनी के बॉन्ड में निवेश करना हर निवेशक के लिए एक सुरक्षित सौदा माना जाता है। मजबूत रिटर्न की उम्मीद और कंपनी के शानदार ट्रैक रिकॉर्ड के चलते इस इश्यू को तय समय से पहले ही निवेशकों की ओर से बंपर रिस्पांस मिल गया, जिससे यह साबित हो गया कि बाजार में आज भी रिलायंस के नाम का सिक्का किस कदर बोलता है।

देश के सबसे बड़े संस्थागत निवेशक एलआईसी (LIC) ने क्यों बनाई इस बॉन्ड से दूरी?

एक तरफ जहां छोटे-बड़े निवेशकों और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने इस बॉन्ड को खरीदने के लिए अपनी तिजोरियां खोल दी थीं, वहीं दूसरी तरफ एलआईसी द्वारा इसमें भारी निवेश न किए जाने की खबर ने वित्तीय विश्लेषकों को थोड़ा हैरान जरूर किया है। सूत्रों और बाजार के जानकारों के मुताबिक, एलआईसी का किसी बड़े इश्यू में बहुत उत्साह न दिखाने के पीछे कोई दुश्मनी या अविश्वास नहीं, बल्कि उनका अपना एक बेहद सख्त और नपा-तुला एसेट-लाइबिलिटी मैनेजमेंट (ALM) और पोर्टफोलियो डायवर्सिफाइड इन्वेस्टमेंट का नियम होता है। एलआईसी पहले से ही रिलायंस समूह की विभिन्न कंपनियों में एक बहुत बड़ी हिस्सेदारी और निवेश रखती है, जिसके चलतेबीमा नियामक (IRDAI) के नियमों और अपने आंतरिक जोखिम प्रबंधन (Risk Management) के तहत उन्हें एक निश्चित सीमा से अधिक राशि किसी एक ही कॉर्पोरेट घराने में झोंकने की अनुमति नहीं होती है।

यील्ड (Yield) और ब्याज दरों का खेल: क्या रिटर्न को लेकर संस्थागत खरीदार थे थोड़े असहज?

बाजार विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि मौजूदा समय में वैश्विक और घरेलू बॉन्ड बाजार (Bond Market) में ब्याज दरों की जो स्थिति चल रही है, उसमें संस्थागत निवेशकों की प्राथमिकताएं काफी बदल चुकी हैं। एलआईसी जैसी विशाल बीमा कंपनियां मुख्य रूप से सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) और ऐसे सुरक्षित साधनों में निवेश करने पर अधिक जोर देती हैं जहां दीर्घकालिक स्थिरता और एक निश्चित रिटर्न की पूरी गारंटी मिलती हो। हो सकता है कि रिलायंस द्वारा इस बॉन्ड पर ऑफर की जा रही यील्ड या ब्याज दरें एलआईसी के दीर्घकालिक वित्तीय पोर्टफोलियो के उम्मीदों के साथ पूरी तरह मेल न खाई हों, जिसके चलते उन्होंने इसमें बड़ा दांव खेलने के बजाय समझदारी दिखाते हुए संयम बरतना ही बेहतर समझा।

कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार पर इसका क्या होगा असर और आगे निवेशकों के लिए क्या है संदेश?

भले ही एलआईसी ने इस विशेष बॉन्ड इश्यू में बहुत बड़ी दिलचस्पी न दिखाई हो, लेकिन इसके बावजूद रिलायंस का यह बॉन्ड इश्यू पूरी तरह से सफल रहा है और यह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय पूंजी बाजार में लिक्विडिटी (Liquidity) की कोई कमी नहीं है। निवेशक आज भी उन कंपनियों पर आंख मूंदकर भरोसा कर रहे हैं जिनके पास मजबूत कैश फ्लो और दूरदर्शी नेतृत्व मौजूद है। इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी सिखाया है कि बड़े संस्थागत निवेशक अपने निवेश के फैसले किसी की देखा-देखी करने के बजाय अपनी आंतरिक जोखिम नीतियों और नफा-नुकसान के गणित को ध्यान में रखकर ही लेते हैं। आने वाले दिनों में जब अन्य बड़ी कंपनियां बाजार में अपने बॉन्ड लेकर आएंगी, तो यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि एलआईसी और अन्य सरकारी वित्तीय संस्थान उनमें किस प्रकार की रणनीति अपनाते हैं।