गैस के नए दामों ने उड़ाई आम आदमी की नींद, जानिए पिछले एक साल में कितना बढ़ गया है आपकी रसोई और गाड़ी का खर्च
देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले महानगर मुंबई और उसके आसपास के इलाकों में रहने वाले करोड़ों लोगों के लिए एक बुरी खबर सामने आई है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली-एनसीआर में सीएनजी और पीएनजी के दाम बढ़ने के कुछ ही दिनों बाद अब मुंबई में भी आम जनता की जेब पर महंगाई का एक और बड़ा और भारी प्रहार हुआ है। महानगर गैस लिमिटेड (MGL) ने हाल ही में अपने आधिकारिक बयान के जरिए कंप्रेसिड नेचुरल गैस (CNG) और पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की खुदरा कीमतों में भारी बढ़ोतरी करने का ऐलान कर दिया है। इस नए और अप्रत्याशित मूल्य संशोधन के बाद से वाहन चालकों और गृहिणियों के बीच भारी निराशा और चिंता का माहौल बन गया है। मुंबई जैसे महानगर में जहां हर रोज लाखों लोग अपने दफ्तरों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और रोजमर्रा के कामों के लिए ऑटो, टैक्सी, कैब या अपने निजी सीएनजी वाहनों पर निर्भर रहते हैं, वहां सीएनजी के दाम बढ़ना उनके मासिक बजट को पूरी तरह से पटरी से उतार देता है। इसके साथ ही हर घर की रसोई में खाना पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाली पाइप्ड नेचुरल गैस यानी पीएनजी के दाम भी बढ़ाए जाने से मध्यम वर्ग के परिवारों का जीना और अधिक मुहाल हो गया है।
सीएनजी के बढ़ते दामों ने बढ़ाई ऑटो, टैक्सी और कार चालकों की मुश्किलें
मुंबई की सड़कों की धड़कन कहे जाने वाले ऑटो रिक्शा, टैक्सियों और कैब सेवाओं के लिए सीएनजी जीवन रेखा की तरह काम करती है। जब भी सीएनजी के दामों में बढ़ोतरी होती है, तो उसका सीधा और तात्कालिक असर ट्रांसपोर्ट और परिवहन लागत पर पड़ता है। महानगर गैस लिमिटेड द्वारा कीमतों में इजाफा किए जाने के बाद अब कैब चालकों और ऑटो यूनियनों के सामने यह संकट खड़ा हो गया है कि वे अपना घर कैसे चलाएं। पिछले कुछ महीनों के दौरान ईंधन की कीमतों में बार-बार होने वाले उतार-चढ़ाव ने कमर्शियल वाहन चालकों की कमर तोड़कर रख दी है। कई चालकों का कहना है कि वे जितनी मेहनत करते हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा केवल गैस भरवाने में ही खर्च हो जाता है, जिससे उनके हाथ में बचत के नाम पर कुछ नहीं बचता। इसके अलावा, जिन लोगों ने पर्यावरण के अनुकूल होने के नाते अपनी निजी कारों में सीएनजी किट लगवाई थी, उन्हें भी अब पेट्रोल के मुकाबले बहुत ज्यादा आर्थिक राहत नहीं मिल पा रही है, क्योंकि सीएनजी के दाम भी अब लगातार पेट्रोल-डीजल की राह पर तेजी से आगे बढ़ते जा रहे हैं।
पीएनजी महंगी होने से हर घर की रसोई का बिगड़ा बजट गणित
सिर्फ सड़क पर चलने वाले वाहन ही नहीं, बल्कि घरों के भीतर चूल्हा जलाने वाली पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) के दामों में हुई बढ़ोतरी ने सीधे तौर पर गृहणियों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। आज के समय में एलपीजी सिलेंडर के झंझट से मुक्ति पाने के लिए महानगरों के अधिकांश घरों में पीएनजी का कनेक्शन लिया गया है, जिसे स्वच्छ, सुरक्षित और किफायती ईंधन माना जाता था। लेकिन जिस प्रकार से लगातार पीएनजी के दाम बढ़ाए जा रहे हैं, उससे अब यह ईंधन भी आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है। महीने के अंत में जब पीएनजी का बिल आता है, तो बढ़ा हुआ अमाउंट देखकर परिवार का बजट हिल जाता है। रसोई का खर्च पहले से ही दाल, चावल, तेल और सब्जियों की महंगाई के कारण चरमराया हुआ था, और अब गैस के दाम बढ़ने से मध्यम वर्ग के परिवारों को अपने बच्चों की अन्य जरूरतों में कटौती करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। गैस कंपनियों का यह दावा भले ही हो कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की खरीद लागत बढ़ गई है, लेकिन आम उपभोक्ता के लिए यह समझना मुश्किल है कि आखिर उसकी आमदनी क्यों नहीं बढ़ती जबकि हर जरूरी चीज के दाम आसमान छूने लगते हैं।
पिछले एक साल में कितनी बढ़ गई है सीएनजी और पीएनजी की कीमतें?
यदि हम पिछले एक साल के आंकड़ों पर नजर डालें, तो पाएंगे कि मुंबई और देश के अन्य हिस्सों में सीएनजी और पीएनजी के दामों में लगातार उछाल आया है। साल-दर-साल के हिसाब से तुलना की जाए तो गैस की कीमतों में प्रति किलोग्राम और प्रति एससीएम (SCM) के हिसाब से भारी बढ़ोतरी दर्ज की जा चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले बारह महीनों में विभिन्न चरणों में हुई मूल्य वृद्धियों के कारण सीएनजी और पीएनजी के कुल दामों में काफी अंतर आ चुका है, जिससे आम आदमी की वार्षिक बचत पर हजारों रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ गया है। जब हर तिमाही या कुछ महीनों के अंतराल पर गैस के दाम 2 रुपये से लेकर 4 रुपये तक बढ़ा दिए जाते हैं, तो साल के अंत तक वह छोटी सी बढ़ोतरी एक बहुत बड़ा वित्तीय बोझ बन जाती है। सरकार और तेल विपणन कंपनियों की इन नीतियों के कारण आज स्थिति यह हो गई है कि स्वच्छ ऊर्जा अपनाने के लिए लोगों को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है, जो पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों दृष्टियों से एक चिंता का विषय बनता जा रहा है।
बढ़ती कीमतों से निजात पाने की आस और भविष्य की चुनौतियां
मुंबई और दिल्ली-एनसीआर समेत देश के अन्य प्रमुख महानगरों में गैस के बढ़ते इन दामों ने एक बार फिर से इस बात पर बहस छेड़ दी है कि क्या आम आदमी के जीवन को सुगम बनाने के लिए ऊर्जा और ईंधन के दामों पर सरकारी नियंत्रण की कोई मजबूत व्यवस्था नहीं होनी चाहिए? बढ़ती महंगाई के इस दौर में जब वेतनभोगियों की आय स्थिर है या बहुत मामूली रूप से बढ़ रही है, तब गैस, बिजली, पानी और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं के दाम लगातार बढ़ना किसी बड़े संकट से कम नहीं है। महानगर गैस लिमिटेड और अन्य संबंधित प्राधिकरणों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दामों में वृद्धि न्यूनतम हो ताकि समाज के कमजोर और मध्यम वर्ग पर इसका सीधा प्रहार न पड़े। फिलहाल तो मुंबई के नागरिकों को बढ़े हुए दामों के साथ ही अपने जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ाना होगा, लेकिन यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है कि आखिर कब तक आम आदमी महंगाई की इस चक्की में पिसता रहेगा और कब उसे इन बढ़ती कीमतों से राहत की सांस मिलेगी।