चार साल में तीन गुना मुनाफा: सरकार के किस मास्टरस्ट्रोक से PSU बैंकों ने पूरी तरह बदल दिया खेल?

चार साल में तीन गुना मुनाफा: सरकार के किस मास्टरस्ट्रोक से PSU बैंकों ने पूरी तरह बदल दिया खेल?

भारतीय बैंकिंग सेक्टर से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने आर्थिक विश्लेषकों और शेयर बाजार के दिग्गजों को हैरान कर दिया है। कभी डूबे हुए कर्ज (NPA) और घाटे के बोझ तले दबे रहने वाले देश के सरकारी बैंकों (PSU Banks) ने पिछले 4 वर्षों में ऐसा टर्नअराउंड दिखाया है, जिसकी कल्पना कुछ साल पहले तक नामुमकिन थी। वित्त वर्ष 2026 के ताजा वित्तीय नतीजों के मुताबिक, सभी 12 सरकारी बैंकों का कुल शुद्ध मुनाफा पिछले 4 साल की तुलना में तीन गुना (300% से अधिक) बढ़ चुका है।

जो बैंक कभी सरकार से बेलआउट पैकेज (आर्थिक मदद) की भीख मांगते थे, वे अब सरकार को बंपर डिविडेंड (लाभांश) दे रहे हैं। आखिर सरकारी बैंकों की किस्मत में यह यू-टर्न रातों-रात कैसे आया? इसके पीछे मोदी सरकार और रिजर्व बैंक (RBI) की कौन सी नीतियां थीं जिन्होंने पूरा खेल बदल दिया? आइए समझते हैं उन 4 बड़े फैसलों को।

1. 4Rs की रणनीति और NPA पर सर्जिकल स्ट्राइक

सरकारी बैंकों की सबसे बड़ी बीमारी थी 'एनपीए' (Non-Performing Assets), यानी वो लोन जो कॉर्पोरेट घरानों ने लिए और चुकाए नहीं। सरकार ने इसके इलाज के लिए 4Rs की रणनीति अपनाई:

  • Recognition (पहचान): बैंकों को सख्त निर्देश दिए गए कि वे कोई भी डूबा हुआ कर्ज छुपाएं नहीं, बल्कि उसे बैलेंस शीट में साफ-साफ दिखाएं।

  • Resolution (समाधान) और Recovery (वसूली): सरकार ने इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्ट्सी कोड (IBC) यानी दिवाला कानून लागू किया। इसके तहत बड़े डिफॉल्टर्स की संपत्तियां कुर्क की गईं, जिससे बड़े कॉर्पोरेट्स में यह डर बैठा कि पैसे नहीं चुकाए तो कंपनी हाथ से निकल जाएगी। इसके अलावा 'बैड बैंक' (NARCL) का गठन किया गया, जिसने बैंकों के फंसे हुए पुराने कर्जों को अपने हाथ में ले लिया, जिससे बैंकों की बैलेंस शीट पूरी तरह साफ (Clean) हो गई।

2. सरकारी बैंकों का मेगा मर्जर (Mega Merger)

साल 2019-20 में सरकार ने एक और साहसिक कदम उठाते हुए 10 बड़े और छोटे सरकारी बैंकों का आपस में विलय (Merger) करके उन्हें 4 बड़े और मजबूत बैंकों में बदल दिया (जैसे पंजाब नेशनल बैंक, कैनरा बैंक, यूनियन बैंक और इंडियन बैंक)।

  • फायदा: इस मर्जर से बैंकों का परिचालन खर्च (Operating Cost) काफी कम हो गया। छोटे बैंकों के पास जो तकनीकी और वित्तीय कमियां थीं, वे बड़े बैंकों के साथ मिलकर दूर हो गईं। बैंकों की लोन देने की क्षमता (Lending Capacity) बढ़ी और वे निजी बैंकों के मुकाबले बड़े प्रोजेक्ट्स को आसानी से फाइनेंस करने में सक्षम हो गए।

3. ऑपरेशनल ऑटोनॉमी (कामकाज में पूरी आजादी)

अतीत में सरकारी बैंकों के डूबने की एक बड़ी वजह राजनीतिक हस्तक्षेप (Political Interference) और फोन-बैंकिंग मानी जाती थी, जहां राजनीतिक रसूख के दम पर बिना सही जांच के बड़े लोन बांट दिए जाते थे।

  • फायदा: सरकार ने बैंक बोर्ड ब्यूरो (BBB) (अब फाइनेंशियल सर्विसेज इंस्टीट्यूशंस ब्यूरो - FSIB) का गठन किया। इसके जरिए बैंकों के शीर्ष प्रबंधन (MD और CEO) की नियुक्तियों को राजनीतिक दखल से दूर कर पूरी तरह पेशेवर (Professional) बनाया गया। बैंकों को यह साफ संदेश दिया गया कि लोन देने का फैसला केवल व्यावसायिक मापदंडों (Commercial Merits) और क्रेडिट स्कोर के आधार पर होना चाहिए, न कि किसी सिफारिश पर।

4. 'प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन' (PCA) और डिजिटल पुश

रिजर्व बैंक और सरकार ने कमजोर बैंकों पर कड़ी नजर रखने के लिए PCA फ्रेमवर्क का कड़ाई से इस्तेमाल किया। जिन बैंकों की माली हालत खराब थी, उन पर नया लोन देने की पाबंदी लगाई गई और उन्हें पहले अपनी वित्तीय स्थिति सुधारने को कहा गया। जब बैंकों का कैपिटल एडिक्वेसी रेशियो (CAR) सुधरा, तभी उन्हें दोबारा खुलकर काम करने की छूट मिली। साथ ही, जन धन योजना और डिजिटल बैंकिंग (UPI व मोबाइल ऐप) के विस्तार ने बैंकों के पास 'लो-कॉस्ट डिपॉजिट' (CASA - करंट और सेविंग्स अकाउंट) का अंबार लगा दिया, जिससे बैंकों की ब्याज से होने वाली कमाई (NIM) में भारी उछाल आया।

क्या कहते हैं आंकड़े?

जहां 2018-19 के दौरान सरकारी बैंक सामूहिक रूप से ₹85,000 करोड़ से अधिक के शुद्ध घाटे में थे, वहीं पिछले 4 वर्षों की लगातार ग्रोथ के बाद चालू दशक (2025-26) में इनका कुल मुनाफा ₹1.5 लाख करोड़ के ऐतिहासिक आंकड़े को पार कर गया है। इसी का नतीजा है कि निफ्टी पीएसयू बैंक (Nifty PSU Bank) इंडेक्स ने पिछले कुछ सालों में निवेशकों को मल्टीबैगर रिटर्न दिया है।

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