Up kiran,Digital Desk : देश के सबसे बड़े स्थानीय निकाय दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के बजट पर हुई सदन की चर्चा ने पार्षदों की गंभीरता और जिम्मेदारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। चार दिन का पूरा समय दिए जाने के बावजूद एमसीडी बजट जैसे अहम मुद्दे पर अधिकांश पार्षद चर्चा से दूर रहे। 259 सदस्यों वाले सदन में महज 71 पार्षदों ने ही बजट बहस में हिस्सा लिया, जबकि 249 चुने हुए और 10 मनोनीत पार्षदों की मौजूदगी अपेक्षित थी।
देर से शुरू हुई बैठक, खाली रही सीटें
बजट चर्चा के लिए बुलाई गई सदन की बैठक अपने तय समय पर शुरू नहीं हो सकी। पार्षदों के समय पर सदन में न पहुंचने के कारण बैठकें देर से शुरू हुईं, जिसका सीधा असर चर्चा की अवधि पर पड़ा। कई बार सदन में बड़ी संख्या में सीटें खाली नजर आईं और बजट पर व्यापक बहस सीमित सदस्यों तक सिमट कर रह गई।
पहले दो दिन ही दिखी सीमित भागीदारी
पार्षदों को बोलने के लिए निर्धारित पहले दिन यानी पांच फरवरी को बैठक करीब आधा घंटा देरी से शुरू हुई। इस दिन 28 पार्षदों ने चर्चा में भाग लिया। अगले दिन छह फरवरी को चर्चा एक घंटे की देरी से शुरू हुई और 40 पार्षदों ने अपनी बात रखी। हालांकि इनमें से अधिकांश पार्षदों ने बजट के प्रावधानों पर चर्चा करने के बजाय अपने-अपने वार्डों की समस्याएं उठाने को प्राथमिकता दी। सत्तापक्ष के पार्षद भी इससे अलग नहीं रहे।
बजट से ज्यादा वार्ड की चिंता
कई पार्षदों का कहना रहा कि नियमित मासिक बैठकों में हंगामे के चलते उन्हें अपनी बात रखने का मौका नहीं मिल पाता। इसी वजह से बजट चर्चा के दौरान मिले मंच का उपयोग उन्होंने अपने वार्ड की समस्याएं सामने रखने के लिए किया। इससे बजट जैसे नीतिगत और वित्तीय मुद्दों पर गंभीर विमर्श प्रभावित हुआ।
चार दिन तय, फिर भी अधूरी बहस
स्थायी समिति की अध्यक्ष सत्या शर्मा द्वारा पेश किए गए बजट पर चर्चा के लिए सदन में चार दिन निर्धारित किए गए थे। इनमें से एक दिन नेता प्रतिपक्ष और आम आदमी पार्टी के पार्षद अंकुश नारंग के लिए तय रहा, जबकि एक अन्य दिन कांग्रेस और इंद्रप्रस्थ विकास पार्टी के पार्षद दलों के नेता नाजिया दानिश और मुकेश गोयल को बोलने का अवसर दिया गया। शेष दो दिन सामान्य पार्षदों की भागीदारी और विस्तृत चर्चा के लिए रखे गए थे, लेकिन अपेक्षित सहभागिता देखने को नहीं मिली।


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