पालकी से सुपरस्टारडम तक: सायरा बानो की मां नसीम बानो, जिन्होंने फिल्मों के लिए की थी भूख हड़ताल
आज की पीढ़ी जब भी सायरा बानो का नाम सुनती है, तो जेहन में एक बेहद खूबसूरत, शालीन और मंझी हुई अभिनेत्री की तस्वीर उभर आती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सायरा बानो को यह शानदार विरासत और बेमिसाल खूबसूरती कहां से मिली? यह हुस्न और टैलेंट उन्हें अपनी मां से विरासत में मिला था, जो अपने दौर की सबसे बड़ी और पहली महिला सुपरस्टार थीं। हम बात कर रहे हैं हिंदी सिनेमा के शुरुआती सुनहरे दौर की 'ब्यूटी क्वीन' नसीम बानो की।
जब हुस्न को छुपाने के लिए पर्दे में रखा जाता था
4 जुलाई 1916 को जन्मीं नसीम बानो का असली नाम रोशन आरा बेगम था। उनका जन्म एक बेहद रसूखदार और शाही परिवार में हुआ था। उनका बचपन इतनी नजाकत और अमीरी में बीता कि वह स्कूल जाने के लिए भी शाही पालकी का इस्तेमाल करती थीं। नसीम बानो बचपन से ही बला की खूबसूरत थीं। उनकी मां उन्हें हमेशा पर्दे में रखती थीं ताकि दुनिया की नजरों से उन्हें बचाया जा सके। मां का सपना था कि उनकी बेटी पढ़-लिखकर डॉक्टर बने, लेकिन रोशन आरा की किस्मत में तो करोड़ों दिलों पर राज करना लिखा था।
एक शूटिंग ने बदली जिंदगी और शुरू हुई भूख हड़ताल
रोशन आरा बेगम के नसीम बानो बनने की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। स्कूल की छुट्टियों के दौरान वह अपनी मां के साथ फिल्म 'सिल्वर किंग' की शूटिंग देखने गईं। वहां के भव्य सेट, कैमरे और कलाकारों के जादू ने उनके दिलो-दिमाग पर ऐसा असर किया कि उन्होंने तय कर लिया कि वह एक्ट्रेस ही बनेंगी।
हालांकि, 1930 के दशक में कुलीन परिवारों की बेटियों का फिल्मों में काम करना समाज को गंवारा नहीं था। जब मशहूर फिल्मकार सोहराब मोदी ने अपनी फिल्म 'हेमलेट' के लिए उन्हें रोल ऑफर किया, तो उनकी मां ने साफ मना कर दिया। लेकिन नसीम बानो भी अपनी जिद की पक्की थीं। फिल्मों में काम करने के लिए उन्होंने घर में ही भूख हड़ताल कर दी। आखिरकार बेटी की जिद के आगे मां को झुकना पड़ा, लेकिन शर्त यह रखी गई कि शूटिंग सिर्फ स्कूल की छुट्टियों में होगी।
'हेमलेट' से धमाका और पहली 'ब्यूटी क्वीन' का खिताब
साल 1935 में जब सोहराब मोदी की फिल्म 'हेमलेट' सिनेमाघरों में रिलीज हुई, तो इसने इतिहास रच दिया। फिल्म सुपरहिट रही और रोशन आरा बेगम रातों-रात 'नसीम बानो' के नाम से मशहूर हो गईं। दर्शक उनकी अदाकारी और जादुई खूबसूरती के दीवाने हो गए। इसके बाद उन्होंने पढ़ाई को अलविदा कह दिया और 'पुकार', 'तलाक', 'मीठा जहर' और 'चांदनी रात' जैसी एक से बढ़कर एक ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं। जिस दौर में सिर्फ पुरुष कलाकारों का बोलबाला था, उस दौर में नसीम बानो ने बतौर फीमेल सुपरस्टार अपनी फीस और स्टारडम से सबको चौंका दिया था।
देश का बंटवारा, पति का पाकिस्तान जाना और सायरा बानो का जन्म
नसीम बानो की पर्सनल लाइफ भी काफी सुर्खियों में रही। उन्होंने फिल्म निर्माता एहसान उल हक से शादी की। इसी दौरान उनके घर बेटी सायरा बानो का जन्म हुआ। जब 1947 में देश का विभाजन हुआ, तो नसीम बानो की जिंदगी में बड़ा मोड़ आया। उनके पति एहसान उल हक भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए, लेकिन नसीम बानो ने अपनी मिट्टी को नहीं छोड़ा। वह अपनी बेटी सायरा बानो के साथ भारत में ही रुक गईं।
बेटी के करियर के लिए छोड़ दिया अपना चमकता हुआ स्टारडम
1950 के दशक के मध्य तक नसीम बानो ने अपने करियर के पीक पर अभिनय की दुनिया को अलविदा कह दिया। उन्होंने यह फैसला अपनी बेटी सायरा बानो के भविष्य और परवरिश के लिए लिया था। वह सायरा बानो को हिंदी सिनेमा की अगली बड़ी स्टार बनाना चाहती थीं, जिसमें वह कामयाब भी रहीं। इसके बाद नसीम बानो ने फैशन डिजाइनिंग में हाथ आजमाया और सायरा बानो की कई फिल्मों के लिए खुद कॉस्ट्यूम डिजाइन किए। जीवन के आखिरी पलों तक बेहद गरिमा और सादगी से रहने वाली इस महान अभिनेत्री ने 18 जून 2002 को मुंबई में अंतिम सांस ली। भारतीय सिनेमा के इतिहास में उनका नाम हमेशा पहली 'ब्यूटी क्वीन' के रूप में सुनहरे अक्षरों में दर्ज रहेगा।