26 रुपये की नौकरी से हिंदी सिनेमा का 'कॉमेडी किंग' बनने का सफर: बस कंडक्टर बदरुद्दीन कैसे बना सबका चहेता ‘जॉनी वॉकर’!

26 रुपये की नौकरी से हिंदी सिनेमा का 'कॉमेडी किंग' बनने का सफर: बस कंडक्टर बदरुद्दीन कैसे बना सबका चहेता ‘जॉनी वॉकर’!

ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा का वह दौर जब परदे पर केवल एक शख्स का चेहरा आते ही थिएटर में ठहाके गूंज उठते थे। सिर पर तिरछी टोपी, पतली मूंछें, मटकती आंखें और लड़खड़ाती जुबान के साथ जब वह कैमरे के सामने आते, तो अच्छे-अच्छे गंभीर अभिनेताओं की चमक फीकी पड़ जाती थी। हम बात कर रहे हैं हिंदी सिनेमा के पहले ऑफिशियल 'कॉमेडी किंग' जॉनी वॉकर (Johnny Walker) की। 300 से ज्यादा फिल्मों में अपनी बेमिसाल कॉमिक टाइमिंग से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले इस महान कलाकार का जीवन किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। एक वक्त ऐसा था जब उनके घर का चूल्हा जलना भी मुश्किल था, लेकिन अपनी मेहनत और अनोखे टैलेंट के दम पर उन्होंने कामयाबी का ऐसा इतिहास लिखा जो आज भी मिसाल है।

जब 26 रुपये की खातिर मुंबई की बसों में की कंडक्टरी

जॉनी वॉकर का असली नाम बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी (Badruddin Jamaluddin Kazi) था। उनका जन्म मध्य प्रदेश के इंदौर में एक बेहद गरीब परिवार में हुआ था। पिता की मिल बंद हो जाने के बाद उनका पूरा परिवार रोटी-रोटी का मोहताज हो गया और वे सब मुंबई आ गए। परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए बदरुद्दीन ने मुंबई की 'बेस्ट' (BEST) बसों में कंडक्टर की नौकरी कर ली। उस जमाने में उन्हें इसके बदले महज 26 रुपये महीना वेतन मिलता था। लेकिन बदरुद्दीन के भीतर एक कलाकार छुपा था। वह बस में टिकट काटते हुए भी मुसाफिरों का मनोरंजन करने के लिए तरह-तरह की आवाजें निकालते, मिमिक्री करते और फनी एक्टिंग करते थे, ताकि यात्रियों का सफर मजेदार हो सके।

गुरु दत्त की पारखी नजर और एक शराबी के किरदार ने बदली किस्मत

बस की इसी कंडक्टरी के दौरान एक दिन उनकी किस्मत ने यू-टर्न लिया। मशहूर बलराज साहनी उस बस में सफर कर रहे थे और उन्होंने बदरुद्दीन के इस अनोखे टैलेंट को भांप लिया। उन्होंने बदरुद्दीन को फिल्ममेकर गुरु दत्त (Guru Dutt) से मिलने की सलाह दी। जब बदरुद्दीन गुरु दत्त के सामने पहुंचे, तो उन्होंने बिना एक बूंद शराब पिए एक शराबी की ऐसी लाइव एक्टिंग करके दिखाई कि गुरु दत्त लोटपोट हो गए। गुरु दत्त उनके अभिनय से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत उन्हें अपनी फिल्म 'बाज़ी' (1951) के लिए साइन कर लिया।

व्हिस्की के ब्रांड पर मिला नाम 'जॉनी वॉकर'

गुरु दत्त को बदरुद्दीन का शराबी वाला अभिनय इतना पसंद आया कि उन्होंने उसी वक्त तय कर लिया कि इस लड़के का फिल्मी नाम कुछ अनोखा होना चाहिए। चूंकि वे बिना शराब पिए शराबी की कमाल की एक्टिंग करते थे, इसलिए गुरु दत्त ने उस दौर की मशहूर स्कॉच व्हिस्की ब्रांड 'जॉनी वॉकर' (Johnnie Walker) के नाम पर उनका नाम 'जॉनी वॉकर' रख दिया। दिलचस्प बात यह है कि जीवन भर फिल्मों में एक से बढ़कर एक शराबी का रोल निभाने वाले जॉनी वॉकर ने असल जिंदगी में कभी शराब को छुआ तक नहीं था। वे एक बेहद अनुशासित और धार्मिक इंसान थे।

300 से ज्यादा फिल्में और डिस्ट्रीब्यूटर्स की शर्त

'बाज़ी' की सफलता के बाद जॉनी वॉकर ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने 'प्यासा', 'सीआईडी', 'कागज के फूल', 'नया दौर' और 'मधुमती' जैसी हिंदी सिनेमा की कल्ट फिल्मों में काम किया। उनका स्टारडम इस कदर बढ़ गया था कि डिस्ट्रीब्यूटर्स फिल्म मेकर्स के सामने शर्त रखते थे कि फिल्म में जॉनी वॉकर का एक गाना और एक कॉमेडी सीन होना ही चाहिए, तभी वे फिल्म खरीदेंगे। मोहम्मद रफी की आवाज में उन पर फिल्माया गया गाना "मालिश... तेल मालिश... सर जो तेरा चकराए" आज भी लोगों की जुबान पर रहता है। उन्होंने लगभग 3 दशक से ज्यादा समय तक 300 से अधिक फिल्मों में काम किया और साल 2003 में इस महान फनकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन अपनी फिल्मों और हंसी के जरिए वे आज भी अमर हैं।

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