जब मूंछें काटने के डर से ठुकराया वो किरदार जिसने दिलाई राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन जैसी पॉपुलैरिटी

जब मूंछें काटने के डर से ठुकराया वो किरदार जिसने दिलाई राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन जैसी पॉपुलैरिटी

भारतीय टेलीविजन और सिनेमा का इतिहास ऐसे कई दिलचस्प किस्सों, अनसुने संघर्षों और रोचक पन्नों से भरा पड़ा है, जिन्हें जानकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं। एक ऐसा ही बेहद मशहूर और दिलचस्प किस्सा भारतीय टीवी के इतिहास के सबसे बड़े महाकाव्य धारावाहिक से जुड़ा हुआ है, जिसने देश के कोने-कोने में तहलका मचा दिया था। टेलीविजन की दुनिया में जब पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं को घर-घर तक पहुंचाने का दौर शुरू हुआ, तो कुछ ऐसे चेहरे सामने आए जिन्होंने इतिहास के पन्नों को हमेशा के लिए अमर कर दिया। लेकिन क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई अभिनेता केवल अपनी मूंछें कटवाने के डर से उस ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित किरदार को ठुकरा सकता है, जो आगे चलकर किसी भी फिल्मी सितारे या राजनेता से ज्यादा बड़ी पॉपुलैरिटी और शोहरत दिलाने वाला था? जी हां, यह कहानी किसी और की नहीं, बल्कि भारतीय मनोरंजन जगत के एक ऐसे दिग्गज कलाकार की है जिन्होंने बाद में अपनी एक अलग ही अमिट छाप छोड़ी और दर्शकों के दिलों पर बेताज बादशाह की तरह राज किया। उनके इस फैसले ने उस समय इंडस्ट्री में खूब सुर्खियां बटोरी थीं और आज भी जब वह किस्सा याद किया जाता है, तो लोग सोच में पड़ जाते हैं कि आखिर एक मूंछ के मोह ने कैसे इतिहास बदलते-बदलते रोक दिया था।

रामानंद सागर की ऐतिहासिक रामायण और उस प्रतिष्ठित किरदार का चयन

बात उन दिनों की है जब देश के मशहूर निर्देशक और निर्माता रामानंद सागर टेलीविजन के पर्दे पर ‘रामायण’ जैसे महाकाव्य को उतारने की तैयारी कर रहे थे। इस धारावाहिक के लिए हर एक किरदार की कास्टिंग बहुत ही बारीकी और फूक-फूक कर की जा रही थी ताकि पात्रों में कोई कमी न रह जाए। जब रावण के महापराक्रमी और विद्वान भाई कुंभकर्ण के ऐतिहासिक किरदार के लिए अभिनेताओं की तलाश शुरू हुई, तो मेकर्स की नजर एक ऐसे मंजे हुए कलाकार पर पड़ी जो अपनी भारी-भरकम आवाज और दमदार अभिनय शैली के लिए जाने जाते थे। वह अभिनेता कोई और नहीं बल्कि जाने-माने और दिग्गज कलाकार नलिन दवे (Nalin Dave) थे, जिन्होंने अपने अभिनय के दम पर गुजराती रंगमंच से लेकर हिंदी सिनेमा और टीवी जगत में अपनी एक खास पहचान बनाई थी। रामानंद सागर खुद चाहते थे कि रावण के भाई कुंभकर्ण के इस खौफनाक, शक्तिशाली और यादगार किरदार को निभाने के लिए नलिन दवे ही सबसे सटीक और परफेक्ट चुनाव साबित होंगे। टीम ने जब उनसे संपर्क किया और उन्हें इस रोल के लिए प्रस्ताव दिया, तो शुरुआत में हर कोई यह मानकर चल रहा था कि वह तुरंत इसके लिए हां कह देंगे क्योंकि इस शो का हिस्सा बनना उस दौर में किसी भी कलाकार के लिए सबसे बड़े सौभाग्य की बात मानी जाती थी।

क्यों मूंछें काटने के नाम पर कांप उठे थे नलिन दवे, जानिए क्या थी इसके पीछे की दिलचस्प वजह

लेकिन कहानी में असली मोड़ तब आया जब नलिन दवे के सामने निर्माताओं ने एक ऐसी शर्त रखी जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। निर्देशक रामानंद सागर और उनकी कास्टिंग टीम ने स्पष्ट कर दिया कि कुंभकर्ण के खूंखार, अद्वितीय और पारंपरिक रूप को जीवंत करने के लिए अभिनेता को अपनी मूंछें पूरी तरह से साफ यानी क्लीन शेव करनी होंगी। उस दौर के थिएटर कलाकारों और अभिनेताओं के बीच अपनी मूंछों को लेकर एक अलग ही किस्म का लगाव और डिसिप्लिन हुआ करता था, और नलिन दवे अपनी मूंछों को अपनी शान और पहचान का बड़ा हिस्सा मानते थे। जब उन्होंने सुना कि उन्हें कुंभकर्ण बनने के लिए अपनी प्यारी मूंछों की बली देनी पड़ेगी, तो वह बुरी तरह डर गए और उन्होंने तत्काल प्रभाव से इस प्रतिष्ठित और महागाथा वाले किरदार को करने से साफ इनकार कर दिया। उनके दोस्तों और करीबियों ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की कि यह कोई साधारण रोल नहीं है बल्कि इतिहास के पन्नों में दर्ज होने वाला एक अमर पात्र है, लेकिन मूंछों के मोह के आगे वह प्रस्ताव उनके लिए किसी बड़े डर से कम नहीं था और उन्होंने इस सुनहरे मौके को अपने हाथों से जाने दिया।

जब नलिन दवे के ठुकराने के बाद नलिन जानी को मिला कुंभकर्ण का वो अमर किरदार

जब नलिन दवे ने मूंछें कटवाने की शर्त के कारण रामानंद सागर की ‘रामायण’ में कुंभकर्ण बनने से मना कर दिया, तो मेकर्स के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई कि अब इस दमदार रोल के लिए किसे चुना जाए। इसके बाद तलाश शुरू हुई और यह प्रतिष्ठित भूमिका एक अन्य प्रतिभाशाली अभिनेता नलिन जानी (Nalin Jani) के हिस्से में आई। नलिन जानी ने बिना किसी झिझक या शर्त के अपनी मूंछें कटवाने का फैसला किया और रामानंद सागर के साथ जुड़कर कुंभकर्ण के इस पौराणिक चरित्र में अपने अभिनय के जरिए ऐसी जान फूंकी कि देखने वाले दंग रह गए। जब वह छह महीने की नींद के बाद उठने वाले और युद्ध के मैदान में जाने वाले कुंभकर्ण के रूप में पर्दे पर प्रकट हुए, तो उनकी भारी आवाज, विशाल कद-काठी और शानदार एक्सप्रेशन्स ने पूरे देश के दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए। वह किरदार रामायण के सबसे लोकप्रिय और आइकॉनिक पात्रों में शुमार हो गया, और नलिन जानी को इस एक ही रोल ने रातों-रात ऐसी ऐतिहासिक लोकप्रियता दिलाई जिसके बारे में उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। देश के बच्चे-बच्चे की जुबान पर उनका नाम आ गया और उनकी लोकप्रियता उस दौर के बड़े राजनेताओं और हस्तियों के बराबर जा पहुंची।

राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन जैसी पॉपुलैरिटी मिलने का वो दौर और इतिहास का सबक

कुंभकर्ण के रूप में नलिन जानी ने जिस बुलंदियों को छुआ, वह इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि कला की दुनिया में अगर समर्पण सच्चा हो, तो एक छोटा या नकारात्मक दिखने वाला किरदार भी अभिनेता को देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी या सदी के महानायक अमिताभ बच्चन जैसी अपार लोकप्रियता दिला सकता है। उस दौर में जब दूरदर्शन पर रामायण का प्रसारण होता था, तो सड़कें सुनसान हो जाया करती थीं और लोग टीवी सेट के सामने ऐसे बैठते थे जैसे किसी महायज्ञ में शामिल हो रहे हों। ऐसे में कुंभकर्ण का वह पावरफुल सीन और संवाद अदायगी आज भी लोगों के जेहन में तरोताजा है। दूसरी ओर, नलिन दवे जिन्होंने सिर्फ मूंछों के मोह और डर के कारण इस ऐतिहासिक प्रोजेक्ट को ठुकरा दिया था, उन्हें जीवनभर इस बात का मलाल जरूर रहा होगा कि कैसे एक छोटी सी जिद ने उन्हें भारतीय टेलीविजन के सबसे बड़े स्वर्ण युग के ऐतिहासिक हिस्से से दूर कर दिया। यह किस्सा आज भी कलाकारों के बीच इस बात की सीख देता है कि कला के रास्ते में अहंकार या छोटी-छोटी शर्तें अक्सर बड़े मौकों को छीन लेती हैं, जबकि समर्पण और त्याग ही इंसान को अमर बनाते हैं।