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Up kiran,Digital Desk : भारतीय वायुसेना की ताकत को और मजबूत करने की दिशा में केंद्र सरकार बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। रक्षा बजट में बढ़ोतरी के बाद अब 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। इस महत्वाकांक्षी रक्षा सौदे पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के प्रस्तावित भारत दौरे से पहले रक्षा मंत्रालय में चर्चा हो सकती है।

रक्षा सूत्रों के अनुसार, करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये के इस प्रस्ताव को पिछले महीने रक्षा खरीद बोर्ड से शुरुआती मंजूरी मिल चुकी है। अब अगले सप्ताह रक्षा मंत्रालय की एक उच्चस्तरीय बैठक में इस पर विस्तार से विचार किए जाने की संभावना है।

क्यों जरूरी हैं नए लड़ाकू विमान?

फिलहाल भारतीय वायुसेना के पास लगभग 30 फाइटर स्क्वाड्रन हैं, जबकि स्वीकृत संख्या 42 स्क्वाड्रन की है। ऐसे में घटती स्क्वाड्रन संख्या और बदलते क्षेत्रीय सुरक्षा हालात को देखते हुए नए लड़ाकू विमानों की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान-चीन की बढ़ती सैन्य नजदीकियां और क्षेत्रीय तनाव के बीच वायुसेना को आधुनिक और बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमानों की तत्काल जरूरत है। इसी वजह से 4.5 पीढ़ी के अत्याधुनिक राफेल विमानों को दीर्घकालिक समाधान के तौर पर देखा जा रहा है।

भारत में बनेगा ज्यादातर राफेल

इस प्रस्ताव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि 114 राफेल विमानों में से लगभग 80 फीसदी का निर्माण भारत में ही किया जाएगा। इसके लिए फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट एविएशन और भारतीय निजी कंपनियों के बीच साझेदारी की योजना है।

प्रस्ताव के तहत भारतीय वायुसेना को 88 सिंगल-सीटर और 26 ट्विन-सीटर राफेल विमान मिलने की संभावना है। सौदा पूरा होने के बाद वायुसेना के बेड़े में राफेल विमानों की संख्या बढ़कर लगभग 150 हो जाएगी। वहीं भारतीय नौसेना के पास भी 26 राफेल मरीन विमान होंगे, जो विमानवाहक पोत से ऑपरेशन के लिए तैयार किए जाएंगे।

राफेल क्यों है खास?

राफेल एक अत्याधुनिक 4.5 जेनरेशन मल्टीरोल फाइटर जेट है, जो हवा से हवा और हवा से जमीन दोनों तरह के मिशनों में सक्षम है। इसमें एडवांस रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियार लगे हैं। हर मौसम और कठिन परिस्थितियों में काम करने की इसकी क्षमता इसे भारतीय वायुसेना के लिए बेहद अहम बनाती है।

फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों के 18 फरवरी को दिल्ली में प्रस्तावित दौरे और एआई समिट से पहले इस रक्षा सौदे पर होने वाली बातचीत को रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।