बच्चों के इस्तेमाल से चलने वाले अपराध के काले कारोबार का पर्दाफाश

बच्चों के इस्तेमाल से चलने वाले अपराध के काले कारोबार का पर्दाफाश

देश के विभिन्न हिस्सों में मोबाइल चोरी की बढ़ती घटनाओं और उसके पीछे सक्रिय शातिर अंतरराज्यीय सिंडिकेट्स ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। हाल ही में झारखंड की राजधानी रांची से लेकर साहिबगंज के कुख्यात तीनपहाड़ इलाके से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने इंसानियत को भी झकझोर कर रख दिया है। अपराधियों ने न केवल मासूम बच्चों को अपनी आपराधिक गतिविधियों का मोहरा बनाया, बल्कि उन्हें संगठित तरीके से चोरी के दलदल में धकेल दिया। इस पूरे सिंडिकेट का संचालन करने वाला तीनपहाड़ गिरोह किस तरह देश के महानगरों से मोबाइल और बच्चों को गायब कर रहा था, इसका खुलासा तब हुआ जब पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए बच्चे विवान को सकुशल बरामद कर लिया। इस सनसनीखेज खुलासे के बाद यह सवाल सबसे बड़ा बन गया है कि आखिर इस तरह के चंगुल में अभी भी कितने मासूम बच्चे फंसे हुए हैं और उनका इस्तेमाल किन-किन अवैध कामों में किया जा रहा है।

तीनपहाड़ गिरोह की कार्यशैली: कैसे मासूमों को बनाया जाता था मोहरा

पुलिस जांच और स्थानीय इनपुट्स के अनुसार, झारखंड के साहिबगंज जिले के अंतर्गत आने वाला तीनपहाड़ और राजमहल क्षेत्र मोबाइल चोरी और बच्चों के इस्तेमाल के इस अवैध नेटवर्क का मुख्य गढ़ बन चुका है। इस गिरोह के सरगना बेहद शातिर तरीके से गरीब और लावारिस या आसानी से बहकाए जाने वाले बच्चों को अपने जाल में फंसाते थे। इन बच्चों को विशेष रूप से भीड़भाड़ वाले इलाकों, मेलों, धार्मिक स्थलों और बाजारों में लोगों की जेबें काटने या हाथ की सफाई दिखाने की ट्रेनिंग दी जाती थी। चूंकि कानूनन कम उम्र के बच्चों पर पुलिस की सीधी कार्रवाई सख्त नहीं होती और बाल सुधार गृहों से वे जल्द बाहर आ जाते हैं, इसलिए इस गिरोह ने अपनी ढाल के रूप में इन्हीं मासूमों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। बच्चे जब भीड़ में मोबाइल या अन्य कीमती सामान उड़ा लेते थे, तो तुरंत उसे अपने आसपास खड़े गिरोह के बड़े सदस्यों को सौंप देते थे, जिससे पकड़े जाने पर भी उनके पास कुछ बरामद नहीं होता था।

IMEI बदलकर देश की सीमाओं को पार कर बांग्लादेश तक पहुँचते थे फोन

इस गिरोह का दायरा केवल देश के महानगरों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इसकी जड़ें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैली हुई थीं। विभिन्न शहरों से चोरी किए गए महंगे स्मार्टफोन्स को एक तय श्रृंखला के माध्यम से पश्चिम बंगाल के रास्ते सीमावर्ती इलाकों तक पहुंचाया जाता था। तकनीकी रूप से बेहद शातिर इस गिरोह के पास ऐसे सॉफ्टवेयर और एक्सपर्ट्स थे जो चोरी किए गए मोबाइल्स का आईएमईआई (IMEI) नंबर पलक झपकते ही बदल देते थे। आईएमईआई बदलने के बाद इन फोन्स को नए जैसी पैकेजिंग में पैक कर दिया जाता था, जिससे पुलिस या सर्विलांस एजेंसियां इन्हें ट्रैक न कर सकें। इसके बाद इन तमाम फोनों को तस्करों के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजार यानी बांग्लादेश तक भेज दिया जाता था, जहां खुलेआम इन चोरी के उपकरणों को खपाया जाता था। इस प्रकार करोड़ों रुपए के मोबाइल देश से बाहर चले जाते थे और मूल मालिकों को कभी अपने उपकरण वापस नहीं मिल पाते थे।

विवान की सुरक्षित वापसी और पुलिस की आगे की बड़ी कार्रवाई

हाल ही में जब रांची से एक छोटे बच्चे विवान के गायब होने और उसे तीनपहाड़ के एक मकान में छिपाकर रखे जाने का मामला प्रकाश में आया, तो पुलिस ने तकनीकी सर्विलांस और रेलवे स्टेशन के सीसीटीवी फुटेज की मदद से इस नेटवर्क के मुख्य चेहरों तक पहुंच बनाई। पुलिस ने ताबड़तोड़ दबिश देते हुए रोहित मुखर्जी और छोटू कुमार सहित कई आरोपियों को दबोच लिया और बच्चे को सकुशल मुक्त करा लिया। हालांकि मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारी से इस नेटवर्क की कमर जरूर टूटी है, लेकिन समाजसेवियों और स्थानीय लोगों के मन में अभी भी यह डर सता रहा है कि इस काले कारोबार के पीछे छिपे अन्य एजेंट और सरगना अभी भी फरार हो सकते हैं। प्रशासन अब यह खंगालने में जुटा है कि इस सिंडिकेट ने अब तक कितने बच्चों को अपना शिकार बनाया है और सीमा पार बैठे किन विदेशी खरीदारों से इनके तार जुड़े हुए थे।