पुल नहीं तो पढ़ाई भी नहीं! मासूमों की मौत के बाद भी नहीं टूटी प्रशासन की नींद, खूंटी में उफनती नदी पार करने को मजबूर हैं लोग

पुल नहीं तो पढ़ाई भी नहीं! मासूमों की मौत के बाद भी नहीं टूटी प्रशासन की नींद, खूंटी में उफनती नदी पार करने को मजबूर हैं लोग

झारखंड के खूंटी जिले के कर्रा प्रखंड से ग्रामीण विकास और बुनियादी ढांचे की पोल खोलती एक बेहद चिंताजनक जमीनी हकीकत सामने आई है। यहां की कुदलूम पंचायत स्थित धरनादा नदी पर आजादी के दशकों बाद भी पुल का निर्माण नहीं हो सका है।

नतीजतन, दिगादोन और पतरा मुछिया सहित दर्जनों गांवों के हजारों ग्रामीण वर्षों से हर साल मानसून के मौसम में नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं।

जैसे ही बारिश के दिनों में नदी का जलस्तर बढ़ता है, इन गांवों का मुख्य जिला सड़क मार्ग से संपर्क पूरी तरह कट जाता है। इसका सीधा और घातक असर क्षेत्र की शिक्षा, आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं, खेती-बाड़ी और ग्रामीणों के सामाजिक-आर्थिक जीवन पर पड़ रहा है।

एम्बुलेंस तक नहीं पहुंच पाती गांव, मरीजों को चारपाई पर ढोने की मजबूरी

स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, पुल के अभाव में सबसे बदतर स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं (Healthcare Services) की होती है। बरसात के चार महीनों के दौरान यदि गांव में कोई व्यक्ति अचानक गंभीर रूप से बीमार हो जाए या किसी गर्भवती महिला को प्रसव के लिए अस्पताल ले जाना हो, तो गांव तक कोई भी वाहन या सरकारी एम्बुलेंस नहीं पहुंच पाती। ऐसे में लाचार ग्रामीण मरीजों को चारपाई (खटिया) पर लादकर पैदल ही उफनती नदी पार कराने का जोखिम उठाते हैं। ग्रामीणों को करीब 10 किलोमीटर का अतिरिक्त और पथरीला चक्कर लगाकर प्रखंड या जिला मुख्यालय पहुंचना पड़ता है। कई बार अस्पताल पहुंचने में होने वाली यह प्रशासनिक देरी मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो जाती है।

स्कूली बच्चों का भविष्य अधर में, बारिश शुरू होते ही बंद हो जाती है पढ़ाई

धरनादा नदी पर पुल और संपर्क सड़क (Approach Road) न होने की सबसे बड़ी मार ग्रामीण क्षेत्र के नौनिहालों और स्कूली बच्चों पर पड़ रही है। नदी में पानी का बहाव तेज होते ही बच्चों का स्कूल जाना पूरी तरह बंद हो जाता है।

  • शून्य उपस्थिति: मानसून के दौरान कई-कई दिनों तक बच्चों की स्कूलों में उपस्थिति शून्य हो जाती है।

  • बाधित शिक्षा: अभिभावकों का कहना है कि जान जोखिम में डालकर बच्चों को तेज धारा में भेजना मुमकिन नहीं है, जिससे उनकी नियमित पढ़ाई और बोर्ड परीक्षा की तैयारियां पूरी तरह बाधित हो जाती हैं।

पहले भी निगल चुकी है कई जानें: मार्शल हेरेंज समेत दो की हो चुकी है मौत

यह उफनती नदी पहले भी कई हंसते-खेलते परिवारों को कभी न भूलने वाला गहरा दर्द दे चुकी है। ग्रामीणों ने बताया कि तीन-चार वर्ष पहले एक मासूम स्कूली छात्र नदी पार करते समय तेज धारा की चपेट में आ गया था, जिससे बह जाने से उसकी मौत हो गई थी। इसके अलावा एक अन्य ग्रामीण मार्शल हेरेंज भी नदी पार करते समय तेज बहाव में बह गए थे, जिनका शव काफी मशक्कत के बाद धरनादा नदी के चेक डैम (Check Dam) के पास से बरामद हुआ था। इन दर्दनाक हादसों के बाद भी सिस्टम की नींद नहीं टूटी है, जिससे ग्रामीणों में स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ गहरा आक्रोश व्याप्त है।

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